यदि सन 1947 में यह कूटनीतिक बंटवारा न हुआ होता तो आज भारत में सरहद के उस पार या इस पार का प्रश्न ही नहीं उठता। दो लोगों को खुश करने की रणनीति ने सारा सत्यानाश कर दिया साथ-साथ भ्रातृत्व भाव और प्यार के एहसास में पलने वालों को एक दूसरे का दुश्मन बना दिया गया, पर इस हृदय का क्या करोगे जो ऐसा जोर मारता है कि पराया भी अपना हो जाता है।मेरे विचार से तो राजनीतिक चालबाजियों एवं अदूरदर्शिता ने ही हमेशा सरहदों का अस्तित्व कायम किया। क्या साथ-साथ रहने वाले जवान सरहदों में बंटकर सच में लड़ना, एक दूसरे को मारना-काटना चाहते हैं? नहीं, बिल्कुल नहीं। परिस्थितियों के वशीभूत उन्हें ऐसा करना पड़ता है। ऐसे में उनके अंतस्तल की पीड़ा को को दूसरा नहीं समझ सकता,केवल कल्पनात्मक स्वरूप ही दिया जा सकता है। वो हमारे दिलों की भावनाओं को भी बेहद दर्दीले स्वरूप में उकेरता है।चलिए देखते हैं -:
सरहद के उस पार,या इस पार क्या
जवान की मनोदशा हमारे अंतः को झकझोरती हैं।
गोली बारूदों की आवाजें ख्यालों में दहलाती हैं।
अपने देश के खातिर मर-मिटने को तैयार,
शहीद हुए भाई-भाई सरीखे नौजवान खुद को ठगा सा पाते हैं।
माता-पिता से जुदा रहते पत्नी बच्चों से दूर,
जान से भी प्यारे हैं जो, वो उम्र भर यादों में ही जीते हैं।
शाम भी ढलती तन्हा गुजरती है जिनकी,
रात भी अनिश्चित सी,अपनों से दूर वो सबको चैन की नींद दिलाते हैं।
देश के वास्ते शहीद हुए, जान कर दी कुर्बान,
वे अश्कों के बहते सैलाब समंदर से नज़र आते हैं।
लेखिका –
सुषमा श्रीवास्तव
मौलिक भाव
सर्वाधिकार सुरक्षित
उत्तराखंड।
