गर्मी के मौसम में जब भगवान सूर्य अपने तेज से भूमि को प्रचंड ताप से दग्ध करते हैं, ऐसी गर्मी में पांच अग्नि जलाकर उसके मध्य पूरी दोपहर बिता देना ही क्या तप है। अथवा जब शीत अपने पूरे जोर पर हो, उस शीत में पूरी रात सरोवर के ठंडे जल में खड़े रहना ही तप है, अथवा अनेकों दिनों तक भोजन का त्याग कर देना तप है, अथवा इन सबसे भी कठिन एक ही स्थान पर अनेकों महीनों निर्जीव की भांति खड़े रहना तथा अपने शरीर को दीमकों का अथवा बढे हुए बालों को पक्षियों को निवास बनते देख भी प्रतिक्रिया न देना तप है। वैसे पुरानी कहानियों को पढकर लगता है कि इस तरह के अनेकों असंभव से कार्य तप माने जा सकते हैं। पर लगता है कि मात्र शरीर को कष्ट देना ही तप नहीं है। संभवतः मन में उपजे विचार ही किसी कर्म को तप बनाते हैं। एक ही तरह की क्रिया तप भी हो सकती है और नहीं भी। पर सत्य है कि मन के विचारों को पहचान पाना असंभव है। मनुष्यों की तो बात ही क्या, देवों के लिये भी प्रायः मन के विचारों को समझ पाना कठिन रहा है। अनेकों बार अयोग्य भी योग्य समझ लिये जाते हैं। अनेकों बार अनेकों योग्यों को अपनी योग्यता सिद्ध करने में बहुत समय लग जाता है।
   खरगोश और कच्छप की दौड़ में यदि खरगोश न रुके तो वही जीतता है। निश्चित ही एक बार एक कहानी में खरगोश प्रतियोगिता के मध्य सो गया था। शायद उसे खुद पर आवश्यकता से अधिक विश्वास था। अथवा शायद वह कच्छप को बिलकुल कमजोर समझ रहा था। लगातार उद्यम का प्रभाव था कि कच्छप खरगोश से पूर्व लक्ष्य तक पहुंच गया।
   लगभग एक ही समय पर भारत वर्ष के दो भिन्न स्थानों पर दो तपस्वियों ने तपस्या आरंभ की। देखने से स्पष्ट प्रतीत हो रहा था कि दोनों तपस्वियों के सामर्थ्य में बहुत ज्यादा अंतर है। जहाँ एक बहुत ज्यादा सामर्थ्यशाली था, वहीं दूसरा बहुत कमजोर।
   गर्मी के दिनों में धूप में बैठकर चारों तरफ अग्नि जलाकर शक्तिशाली तपस्वी अनेकों दिनों बैठा रहा। लगता नहीं कि उसके शरीर को कोई भी कष्ट हो रहा है। वहीं दूसरी तरफ दूसरे तपस्वी को एक दिन भी इस तरह गुजार पाना असह्य रहा। कुछ ही घंटों में वह अग्नि से निकलकर एक वृक्ष के नीचे बैठ आराम करने लगा। यह अलग बात थी कि उस तपस्वी ने प्रति दिन अपनी सामर्थ्य से पंचाग्नि जलायी। तप का क्रम जारी रखा।
   शीत ऋतु आ गयी। शक्तिशाली तपस्वी नजदीकी सरोवर में घुसा तो फिर वहीं खड़ा रहा। दूसरी तरफ कमजोर शरीर बाले तपस्वी कुछ ही समय में ठंड से कांपकर बाहर आ गया। जल्द अग्नि प्रज्वलित कर उसने अपने प्राण बचाये।
   निराहार रहकर तप करने में भी पहला ही तपस्वी श्रेष्ठ था। कुछ दिनों उसने जल पीया। फिर जल भी त्याग दिया। केवल वायु का सेवन करते हुए उसकी तपस्या चलती रही।
  दूसरे तपस्वी के लिये निराहार रह पाना ही संभव न था। वह अलग बात थी कि उसने अपने तप को जारी रखने के लिये कुछ निश्चित मात्रा में ही फलों और जगंली कंद मूलों का सेवन करना जारी रखा।
  यदि इन दोनों तपस्वियों के तप का तुलनात्मक अध्ययन करें तो निश्चित ही पहला तपस्वी खरगोश था तो दूसरा कच्छप। फिर इस तुलना में खरगोश बीच में सोया भी न था। लक्ष्य निश्चित ही पहले खरगोश ही प्राप्त करेगा। पर लक्ष्य प्राप्ति के बाद भी उसके तप का औचित्य ज्ञात होगा। लक्ष्य प्राप्ति के बाद ही ज्ञात होगा कि उसने इतनी कठोर तपस्या किस उद्देश्य के लिये की है। लक्ष्य प्राप्ति के बाद ही कहा जा सकता है कि उसका उद्देश्य कितना विश्व कल्याण से जुड़ा हुआ है।
   एक दिन
  अंतरिक्ष में दिव्य प्रकाश फैलने लगा। उसी दिव्य प्रकाश में जगत पिता, चतुर मुख भगवान बह्मा अपने वाहन हंस पर बैठे दिखाई देने लगे। पहले तपस्वी की तपस्या पूर्ण हुई। भगवान बृह्मा उसी तपस्वी की कामना पूर्ण करने आये थे।
   साधक वही है जो किसी भी तरह की कामना न रखे। कामना युक्त मनुष्य कभी भी साधक नहीं बन सकता है। कामना हमेशा पतन का कारण बनती है। कामना युक्त को तपस्वी किस तरह माना जाये, यह एक यक्षप्रश्न है।
  दूसरा प्रश्न है कि क्या यह संभव है कि ईश्वर की त्रिगुणात्मक सृष्टि में कोई भी निष्काम हो सके। लगता तो नहीं। प्रत्येक के मन में कोई न कोई कामना तो होती ही है। कोई खुद के सुखों की कामना करता है। तो कोई पूरे विश्व के सुखों की कामना करता है। कोई कामना करता है कि उसके जीवन में कोई भी दुख न रहे। कोई कामना करता है कि पूरे विश्व में कोई भी दुखी न रहे। कोई दूसरों को कष्ट देकर आनंद की अनुभूति करता है। तो किसी के लिये आनंद दूसरों के कष्ट का निवारण है। सत्य है कि कुछ पशुता की कामना करते हैं तो कुछ यथार्थ मानव बनने की कामना करते हैं।
  कामना तो सभी करते हैं। तथा यही कामना वह भेद है जो मनुष्य के उत्थान और पतन की हेतु बनती है। यह कामना ही मनुष्य को देव या दानव बनाती है। निश्चित ही मात्र तपस्या में शीघ्र लक्ष्य प्राप्ति तप की श्रेष्ठता नहीं है। श्रेष्ठता तो उसी कामना में निहित है जिसकी प्राप्ति के लिये कठोर तप किया गया था।
  कामना करना निःसंदेह पतन और उत्थान का कारक है । यही विचार देव और दानव का भेद कराती है । यद्यपि तपस्या बहुत जटिल प्रक्रिया है , यथासंभव अतिशीघ्र फलित नहीं होती । परंतु लक्ष्य कठोर ही तो  तप है ।
  
  
क्रमशः अगले भाग में 
दिवा शंकर सारस्वत ‘प्रशांत’
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