अहंकार से मदमस्त पुरुष को सही और गलत का भेद समझ नहीं आता। शक्ति को ही सही और शक्तिहीनता को गलत मान परिभाषित करते रहते हैं। उनके विचार में संसार में गलत केवल शक्तिहीनता ही होती है। वैसे सैद्धांतिक रूप में भले ही ऐसे लोगों के विचारों को गलत कहा जा सकता है। पर व्यावहारिक सत्य यही है कि शक्ति की भी अपनी महत्ता है। धर्म और सिद्धांतों की रक्षा भी शक्ति से ही की जाती है। हमेशा शांति स्थापित करने के लिये शक्ति का प्रयोग होता रहा है।
   संभवतः बृह्मा जी समझ गये कि महिषासुर को सत्य नहीं समझाया जा सकता है। वास्तव में महिषासुर तो असुर था पर लगता है कि त्रिलोकी ही महिषासुर की तरह स्त्रियों को शक्तिहीन मानने लगी थी। संभवतः युगों से खुद को अबला परिभाषित होते सुन स्त्रियां भी इसी असत्य को सत्य समझने लगी होंगीं। लगता है कि एक बार पृथ्वी पर स्त्रियों के सामर्थ्य को स्थापित करने की आवश्यकता रही होगी।
  ” ठीक है। मैं तुम्हें वर देता हूं कि मेरी पूरी सृष्टि में तुम सभी पुरुषों से अजेय होंगें। कोई भी पुरुष तुम्हें हरा नहीं पायेगा। कोई भी पुरुष तुम्हारी मृत्यु का कारण नहीं बनेगा।”
  बृह्मा जी के वर से महिषासुर लगभग अजेय बन गया। संसार के सभी असुरों ने उसे अपना स्वामी मान लिया। संगठन से शक्ति और बढती ही है। शुंभ, निशुंभ, रक्तबीज जैसे महाबली असुरों ने भी महिषासुर को अपना स्वामी मान लिया। यह दूसरी बात थी कि महिषासुर ने भी शक्तिशाली असुरों को मित्र की भांति सम्मान दिया। बुराई में भले ही लाख बुराइयाँ हों पर बुराई भी कुछ अच्छाइयों को नहीं छोड़ती। एकता तथा सहयोग जैसे सिद्धांत प्रायः उत्तम सोच बालों में निष्प्रभावी रहते हैं। प्रायः एक सही व्यक्ति को अपनी सही बात के समर्थन में भी किसी का साथ नहीं मिलता। पर बुराइयों को ही जीवन का धर्म मानने बाले सत्य को झूठ सिद्ध करने में, अच्छाई को हराने में मिलकर अपनी पूरी शक्ति लगा देते हैं। आज भी अच्छाई की प्रमुख समस्या ही एकाकीपन है।
   तीनों लोकों में असुरों का डंका बजने लगा। जब सृष्टि की रक्षा के लिये उत्तरदायी भगवान विष्णु तथा उचित समय पर सृष्टि का विनाश करने बाले भगवान शिव भी असुरों का सामना न कर पाये तो फिर अन्य की क्या बिसात। मनुष्य, नाग, यक्ष, देव सभी असुरों के शरणावर्ती बन अपने प्राणों की रक्षा करने लगे। अब स्वर्ग की सभा में देवराज इंद्र आसुरराज को देख अपना आसन छोड़ आसुरराज की चरण सेवा करने लगते। जिस सभा में अपना अधिकार दिखाकर कभी देवराज अप्सराओं का नृत्य देखते थे, अब उसी सभा में अप्सराओं के नृत्य के समय वह खुद महिषासुर के पैर दबाते थे, इससे अधिक लज्जा की क्या बात हो सकती है।
   अमरता का ढोंग करना आसान है। पर अमर होना आसान नहीं। त्रिलोकी में अमर जिनका एक पर्यायवाची है, उन देवों द्वारा प्राणों के भय से अपने आत्मसम्मान को भी गवा देना यही तो सिद्ध करता है कि वास्तव में देव अमर तो नहीं।
  स्वर्ग लोक की सभा में असुर स्वर्ग के दुर्लभ भोग भोग रहे थे, उसी समय स्वर्ग के ही एक भवन में कुछ देव इकट्ठा थे। इन देवों को बहुत समय से स्वर्ग सभा में नहीं देखा गया था। भोगों में रत विभिन्न देवों को ज्ञात ही नहीं था कि उनके कुछ साथी कहाॅ हैं। सत्य है कि भोगों में अपना जीवन बिताते आये देवों को ज्ञात ही नहीं था कि सच्चा आनंद वास्तव में आध्यात्मिक होता है। परोपकार में जीना और परोपकार में प्राण गंवा देना ही वास्तव में किसी के भी जीवन का ध्येय है। यह भवन पुष्कर माली और कुण्डला का था। जो वास्तव में आध्यात्मिक साधना का केंद्र बना हुआ था। बहुत समय से आध्यात्मिक साधना में रत पुष्कर माली सहित कुछ देव आज वीर वेष में तैयार थे। शायद यह भी उनकी साधना का अंग था। शायद इस समय केवल यही सही साधना होगी।
  आज कुण्डला समझ नहीं पा रही थी कि खुशियां मनायें अथवा दुखी हो। वैसे लगता है कि यह दुखी होने का समय है। जिन शक्तिशाली असुरों ने भगवान विष्णु को हरा दिया, उनके सामने भगवत आराधना में लगे रहने बाला पुष्कर माली कुछ भी न था। पर सत्य है कि परोपकार के लिये प्राणों को भी दाव पर लगाया जाता है।
  ” देवी। क्या दुखी हो।” पुष्कर माली का संक्षिप्त प्रश्न।
  ” सत्य कहूं तो कुछ कुछ। सत्य कहूं तो आज अपने ही पूर्व सिद्धांतों से दूर जाने की इच्छा है। सत्य कहूं तो लगता है कि हमारा और आपका साथ कभी समाप्त न हो। पर सत्य है कि मेरी पूर्व धारणा ही सत्य है। सत्य है जीवन हमेशा अनित्य है। फिर वह जीवन मानव का हो अथवा किसी देव का। सत्य है कि परोपकार में अपने प्राण त्यागने बाले सच्चे अमरत्व को प्राप्त होते हैं। वे आवागमन के चक्र से मुक्त हो जाते हैं। स्वामी। निश्चित ही मैं कुछ विचलित हूं। पर सत्य है कि मैं आपका आध्यात्मिक हित चाहती हूं। चाहती हूं कि आप इस आवागमन के चक्र को पार कर जायें। “
  कुण्डला के नैंत्रों से अश्रु विंदु निकलने लगे। आंखें तो पुष्कर माली की भी गीली हो गयीं। पर जल्द ही दोनों ने अपनी आंखों के आंसू पोंछ लिये। पुष्कर माली को आरती कर कुण्डला ने विदा कर दिया। आज ये देव जो कि वास्तव में देवत्व को समझते थे, बहुत समय बाद स्वर्ग की सभा को जा रहे थे। अपने प्राणों को बलिदान कर अमरत्व की राह पकड़ने बाले थे। सत्य है कि इस समय ये असुर अजेय हैं। पर गुलामी तो उचित नहीं। जीवन हानि कोई हानि नहीं। वैसे भी आज तक कितनी बार जन्मते और मरते रहे हैं। संभव है कि यह बलिदान ही कुछ नवीन बदलाब को जन्म दे।
क्रमशः अगले भाग में 
दिवा शंकर सारस्वत ‘प्रशांत’
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