ये दुनिया भी किसी अखाड़े से कम नहीं।
ढ़ेरों खुशियों के संग ढ़ेरो गम भी यहीं।
कभी खुद खाते हैं हम पटखनी।
कभी हम देते हैं किसी को पटखनी।
कभी सीधा पड़ता है दाॅंव।
कभी उल्टा पड़ता है दाॅंव।
जीतने के लिए धूल से लिपटती गात।
हारने में भी धूल से लिपटती गात।
जीतने पर गदगद दिल से स्वीकारते बधाई।
हारने पर प्रतिद्वंदी को बेमन से देते बधाई।
-चेतना सिंह,पूर्वी चंपारण।
