लफ़्ज मिलते ही नहीं कैसे मैं बयाँ करूँ
तेरी बेरुखी इस कदर उतरी ज़ेहन में मेरे ✍️
कभी तू सोचना हया की पाकीज़गी को
कितनी बेहयाई छुपी है पाक़ दामन में तेरे ✍️
महफ़िल में तुम्हारी नज़रें रोज चार होती हैं
नुमाईश हो रही है हुस्न की चिलमन से तेरे ✍️
कुछ तो कहो तुम आके अपनी सफाई में
कटते ही नहीं दिन-रात इसी उलझन में मेरे ✍️
अखाड़े के जैसी हो गयी ये इश्क़ की बाज़ी
सब देखते हैं तन कोई पढ़ता नहीं मन को मेरे✍️
रचनाकार – अवनेश कुमार गोस्वामी
