वक्त की आंधियां इस कदर छाई है,
गिरे तो मुश्किल से संभल पाई है,
ज़िन्दगी की इस तेज़ रफ़्तार ने
कई घरों से देखो छते तक उड़ाई है।
बेवजह हमसे कुछ चाहतें चुराई है,
नामुमकिन सी ख्वाहिशेँ जगाई है,
हसरतें दिल में रख भूलाना ही सही
मुमकिन सफर की राह कब दिखाई है।
यहाँ कब हमने अपनी मर्ज़ी चलाई है,
जो मिला हमने तो उससे ही निभाई है,
तक़दीर और चाहत कब एक हुए
जीवन में कठिन बस यही एक लड़ाई है।
स्वरचित
शैली भागवत ‘आस’
