जिज्ञासा अर्थात जानने की इच्छा,अंजान चीज़ों से, स्थानों से,और लोगों से परिचित होने की,उसे समझने-बूझने की उत्कंठा ही जिज्ञासा है जो हर किसी में होती है।इसकी कोई सीमा नहीं होती है यह हर किसी के अंदर होती है बस मात्रात्मक फर्क देखने को मिल जाता है। उम्र और आवश्यकतानुसार इसके प्रारूप में परिवर्तन होता रहता है।सबसे अधिक जिज्ञासु प्रवृत्ति शैशवकाल से लेकर बाल्यावस्था और किशोरावस्था तक देखने को मिलती है। कभी पढ़ी हुई चार पंक्तियों की एक कविता के माध्यम से भी कुछ कहना चाहूँगी “कौन नारियल के पेड़ों पर,
जादू   सा  कर  जाता  है!
बंद कटोरी में मीठा जल 
चुपके  से  भर  जाता है!
यह कविता भी बालमन की अद्भुत जिज्ञासा को ही दिखाती है।
   सभी अपनी अपनी जिज्ञासा को किसी न किसी माध्यम से शान्त करते ही हैं क्योंकि जबतक वह शांत नहीं होती मन-मस्तिष्क में अजीब सी बेचैनी रहती है। एक शिशु क्रमिक रूप से अपनी जिज्ञासा को शांत करने के लिए माता-पिता, अभिभावक,संगी साथी,शिक्षक और शिक्षा तथा स्वयं के आसपास उपलब्ध साधनों से प्रयास करता है। ज्यों-ज्यों हम बढ़ते जाते हैं हमारे विवेक का विकास होता है हमारी जिज्ञासा एवं उसे शांत करने के तौर तरीकों में भी बदलाव आता जाता है।अब चलती हूँ, बहुत समय हो गया है ऐसे मनोभाव पर लिखने को बहुत कुछ लिखा जा सकता है पर समय की मजबूरी जाने को कह रही है।
धन्यवाद!
राम राम जय श्रीराम!
मौलिक विचार, सर्वाधिकार सुरक्षित, उत्तराखंड।
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