“तुम बिन सूना-सूना सावन
          तुम बिन सूना फाग है ये।
         तुम बिन फीके रंग हुए सब,
           बोलो क्या अनुराग है ये।।
तुम बिन सूनी-सूनी राते दिन भी ये सूना-सूना है।
          रंगों का त्योहार भी लगता 
        अब तुम बिन सूने से दूना है।।
          इस होली पर लगता जैसे, 
            कोई बदनुमा दाग है ये।
‌          तुम बिन फीके रंग हुए सब,
           बोलो क्या अनुराग है ये।।
तुम बिन होली बीत गई, न बीते यह काली रातें।
बिना तुम्हारे किसे बताऊं, अपने मन की ये बातें ।
प्रीत हमारी ठुकराई है, बोलो कैसा त्याग है ये।
             तुम बिन फीके रंग हुए सब,
               बोलो क्या अनुराग है ये।।
            धड़कन चलती है साँसों बिन।
                 पुष्प पराग हीन जैसे।
              बिना ताल सुर के लगता है, 
                सबको ढ़ोल दीन जैसे।।
               सब कुछ सूना-सूना लगता, 
                  बोलो कैसी आग है ये।
              तुम बिन फीके रंग हुए सब,
                बोलो क्या अनुराग है ये।।
होली हुई आज बेरंग है रंगो का हुड़दंग नहीं।
सूना है दिल का कोना मन में कोई तरंग नहीं।।
अंधियारे में काम न आए, कैसा भला चराग है ये।
            तुम बिन फीके रंग हुए सब,
              बोलो क्या अनुराग है ये।।
           घायल हुआ हृदय इतना 
            ये नयना गीले गीले हैं।
मन को न भाते तुम बिन, रंग ये नीले पीले हैं।
सूने-सूने लगते जैसे बापी, कूप तडाग हैं ये।
           तुम बिन फीके रंग हुए सब,
            बोलो क्या अनुराग है ये।।
         हँसती हूँ खुशियों के बिन मैं।
             सूनी रात कहानी बिन।
          मौसम पतझड़ का आया है
           नदियाँ सुखी पानी बिन।।
        पिया हृदय को व्याकुल करती, 
             जाने कैसी आग है ये।
          तुम बिन फीके रंग हुए सब,
            बोलो क्या अनुराग है ये।।
            भाती न सखियों की टोली,
            न भाती कोयल की बोली।
            सूना है खुशियों का घरौंदा
           बैठी तुम बिन आज अकेली।।
            कहे अम्बिका तुम बतलाओ,
                 मेरा कैसा भाग है ये।
              तुम बिन फीके रंग हुए सब,
               बोलो क्या अनुराग है ये।।”
              अम्बिका झा ✍️
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