अपनी छोटी सी मगर असरदार मौजूदगी का एहसास कराती है नन्ही चिड़िया गौरैया l
जो आम भाषा चिड़ा या चिड़िया आदि नामों से जानी जाती है l यह माना जाता है कि गौरैया चिड़िया मनुष्य की  तरह घरेलू ही है यह जंगल में खुले आसमान के नीचे स्वतंत्र होकर नहीं, मनुष्य के साथ उन्हीं की तरह उनके घरों में रहना पसंद करती है l जहाँ जहाँ मनुष्य वहीं वहीं इन चिड़ियों के झुंड l
मनुष्य की तरह ही है ,यह भी अपने परिवार का पालन पोषण करती है और एक अच्छे परिवार का उदाहरण सबके समक्ष रखती है l नर व मादा चिड़ियाँ दोनों मिलकर घोंसला बनाते हैं l एक तिनका लाता है तो दूसरा तिनको को सहेज कर तिनके-तिनके से घोंसला बनाता है नर और मादा बारी-बारी से अंडों की सुरक्षा का ध्यान करते हैं l अंडे फूटने पर नन्हें शिशु की देखभाल व पोषण की जिम्मेदारी भी दोनों बखूबी निभाते हैं और फिर बड़े होने पर बच्चे उड़ जाते हैं नर व मादा चिड़िया फिर जीवन की दैनिक क्रिया में लग जाते हैं परंतु मनुष्य जैसे जैसे प्रकृति से दूर हुआ वैसे वैसे इस नन्ही चिड़िया से भी उसने दूरी बना ली l
 उसने अपने घरों के दरवाजे से इस नन्हे से जीवन के लिए बंद कर दिए और एक समय में विश्व में सबसे बड़ी प्रजाति का खिताब पा चुकी यह गौरैया चिड़िया विलुप्त होती चली गई lबढ़ती निर्माण गतिविधियाँ,प्रदूषण, कीटनाशक का अधिक प्रयोग, बिल्डिंग पैटर्न में बदलाव, बगीचों की कमी, टीवी व मोबाइल टावरों से निकलने वाला विकिरण जो उनके नेविगेशन आदि को प्रभावित करता है ऐसे आदि के कारणों से गौरैया चिड़िया की प्रजाति में भारी गिरावट आई l
शहरों हो या गाँव अब सब जगह पक्के और ऊँचे मकानों में गौरैया व उसके बच्चों के लिए कोई स्थान नहीं l
इतनी ऊंची ऊंची इमारतें और पक्के परसों पर गोरैया अपना घोंसला नहीं बनाती l इतनी ऊंचाई से अंडों के गिरने का खतरा बराबर बना रहता है l
गौरैया की विलुप्त हुई प्रजाति के परिणाम स्वरूप कुछ एनजीओ, गैर-लाभकारी संस्थाएँ,सामाजिक संस्थाएँ, राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय संगठन व कई सामाजिक कार्यकर्ता इसके संरक्षण हेतु आगे आए l जिन्होंने गौरैया पक्षी को आश्रय दिया इस पक्षी की सुरक्षा पोषण व संरक्षण के विषय में सोचा l
उनकी इसी पहल को ध्यान में रखते हुए विश्व गौरैया दिवस मनाने की मुहिम चली जो आज तक जारी है lबीस मार्च को हर साल विश्व गौरैया दिवस गौरैया के पतन व शहरी वातावरण में पाए जाने वाली अन्य पक्षी प्रजातियों के बारे में जागरूकता पैदा करने के उद्देश्य से मनाया जाता है l यह एक विश्वव्यापी पहल है  जो इको-सिस एक्शन फाउंडेशन ( फ्रांस) व नेचर फॉरएवर सोसाइटी (भारत ) के मिले-जुले प्रयास से चलाया जा रहा है l मैं यह तो नहीं कहती कि आप भी इन संस्थाओं जैसे कार्य करें या इनसे जुड़े पर इतना अवश्य कहना चाहूँगी l
जिस चिड़िया की चहचहाहट सुनकर, होती थी कभी सुबह हमारी
 वह नन्ही चिड़िया भी है आश्रय व पोषण की है अधिकारी
 एक कोना ऐसा अपने घर में जरूर बनाना यारो
 जिसमें रहे कोई चिड़िया और उसकी आवाज से गूँजे यह धरती सारी
 चलो चलें प्रकृति की ओर एक छोटा-सा प्रयास कर बदले दुनिया किसी की 
 सुरक्षित जीवन दे नन्हें जीवन को,ये बात न रही अब केवल हमारी तुम्हारी
 लौट आए अपने घर व स्वच्छ वातावरण में फिर से वो 
खो रही अपना अस्तित्व भी,जो थी कभी सबकी प्यारी
 स्वरचित एवं मौलिक
 सुनीता कुमारी अहरी
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