कात्यायनी धीरे धीरे बड़ी होने लगी। जहाँ पिता ने कात्यायनी को पढाई तथा योग्य बनने के पूरे अवसर दिये, वहीं लक्ष्य प्राप्ति के लिये कठोर भी थे। कात्यायनी को सफलता पर पिता द्वारा उत्साह वर्धन मिलता। वहीं जब पिता को लगता कि बेटी अपने जीवन लक्ष्य के प्रति उदासीन हो रही है, उस समय कात्यायन कुछ कठोर भी बन जाते।
   ” रहने दो कात्यायन। बेटी पर इतनी कठोरता कब ठीक है। वैसे भी लड़की के लिये तो घर संवारना ही मुख्य कला है। इसके लिये भाभी जी उसे उचित शिक्षा दे ही देंगीं। पिता द्वारा बार बार बेटी की समीक्षा करना उचित तो नहीं।”
  मित्र की बात सुन कात्यायन की आंखों से अंगारे से बरसने लगे।
” छत्रप। इस विषय में तुमसे कोई सलाह नहीं चाहिये। बेटियां कभी भी बेटों से कम नहीं। मेरी बेटी भी मेरा बेटा है। वह केवल गृहकार्य तक सीमित नहीं रहेगी। एक दिन संसार को नारी की सामर्थ्य बन दिखायेंगी। मैं तो बस पिता का कर्तव्य पूर्ण कर रहा हूं।”
   प्रेम और अनुशासन के उचित संगम से कात्यायनी की क्षमता में उत्तरोत्तर वृद्धि हुई। जहाँ एक तरफ कात्यायनी अनेकों शास्त्रों की जानकार थी, वहीं उस काल में राजकुमारों को दी जाने बाली शस्त्र शिक्षा भी कात्यायनी ने प्राप्त की। शस्त्र ज्ञान में कात्यायनी का यश चहुंओर फैल चुका था। अनेकों प्रतियोगिताओं में वह अनेकों क्षत्रिय राजकुमारों को भी हरा चुकी थी। एक कन्या का वीरांगना बाला रूप हमेशा उसके विदुषी रूप पर अधिक वर्चस्व स्थापित कर लेता है। नारियों की कमजोरी का जमकर बखान करने बाले ही अक्सर नारियों की शक्ति का अधिक प्रचारित कर देते हैं। हालांकि उनका प्रचार अक्सर सकरात्मक नहीं होता है। 
   कहीं कात्यायनी की दक्षता को नारियों द्वारा पुरुषों से बराबरी का उपक्रम बताया जाता। तो कुछ परम ज्ञानियों के अनुसार स्त्रियों द्वारा पुरुषों से बराबरी का प्रयास ही गलत है। वैसे भी स्त्रियां पुरुषों से श्रेष्ठ ही होती हैं। फिर बराबरी का दिखावा करने का आशय तो खुद को कमतर दिखाना ही है। 
  कभी कभी कात्यायनी की दक्षता तथा उसके पुरुषों के साथ मुकाबला करने को मर्यादा का अतिक्रमण ही मान लिया जाता। मर्यादाहीन शक्ति भला किस काम की है। 
   पिता के परामर्श तथा खुद की बुद्धि से निर्णय के कारण कात्यायनी सही और गलत की विवेचना कर पाने में सक्षम थी। मुख्य था, उसका गलत देख विरोध की पहल करना। वैसे तो अनेकों वर्षों से कुण्डला भी पृथ्वी पर नारियों को उनकी शक्ति का परिचय करा रही थी। अपनी अपनी स्त्रियों के विरोध से अनेकों पुरुष उन दुर्गुणों से दूर हो गये जिनकी लत में वे कभी अपना स्वास्थ्य और धन दोनों बर्बाद कर रहे थे। फिर भी वे मदिरालय सूचारु थे। अभी भी विभिन्न मदिरालयों पर पुरुषों की अपार भीड़ रहती। 
   विरोध के साथ साथ ही समर्थन भी बढता जाता है। किसी के विषय में दुष्प्रचार भी उसकी ख्याति को बढाता ही है। साथ ही साथ विश्वास में बृद्धि कराता ही है। 
   एक दिन कात्यायनी ने अपनी सामर्थ्य पर कुछ अधिक विश्वास कर दिया। कुछ सखियों के साथ एक मदिरालय पर धरना दे दिया। मदिरालय संचालक असुरों को मदिरालय छोड़ भागने पर मजबूर कर दिया। 
   कात्यायनी की एक छोटी सी पहल एक चिंगारी से बढकर भीषण दावानल में बदल गयी। कुण्डला के प्रयासों से पहले ही स्त्रियां काफी जागरूक हो चुकी थीं। फिर कात्यायनी के प्रयत्न की सफलता ने प्रज्वलित अग्नि में घृत का कार्य किया। अलग अलग स्थानों पर विभिन्न स्त्रियों के नैत्रत्व में मदिरालय बंद कराये जाने लगे। वैश्यावृत्ति को मजबूर अनेकों कन्याओं को असुरों के बंधन से मुक्त कराया गया। गुरुकुलों से वेतन लेकर केवल सांध्य कक्षाओं में अतिरिक्त शुल्क लेकर छात्रों को पढाने बाले शिक्षक, चिकित्सा धर्म को व्यवसाय के रूप में चलाने बाले चिकित्सकों, नकली दवाइयों के कारोबारियों, खाद्य पदार्थों में मिलावट करने बालों, तथा धर्म के नाम पर अधर्म का पाठ पढाते धूर्त गुरुओं का अलग अलग स्त्रियों के नैत्रत्व में प्रबल विरोध होने लगा। पुरुषों द्वारा अजेय रहे वे असुर लगातार स्त्रियों के विरोध से पराजित होने लगे। 
   संसार की विभिन्न स्त्रियां जिनमें अनेकों माताएं थीं, पुत्रियाँ थी, कुछ तपस्विनी थीं, कुछ वेदों की जानकार थीं, कुछ विज्ञान की ज्ञाता थीं, उनके नैत्रत्व में अत्याचारों का विरोध आरंभ हो चुका था। अनेकों विलक्षण प्रतिभाओं से युक्त स्त्रियों जो नारी शक्ति की पर्याय बन रही थीं, धीरे-धीरे दुर्गा शक्ति के नाम से जानी जाने लगीं। 
   वास्तव में यह एक मिथक ही है कि माता दुर्गा ने असुरों का वध किया। सत्य तो यही है कि दुर्गा नामक किसी एक स्त्री या देवी का कहीं भी उल्लेख नहीं मिलता है। वैसे भी माता दुर्गा के नवरूप यही सिद्ध करते हैं कि दुर्गा उस सम्मिलित नारी शक्ति का नाम था जो अन्याय के विरोध में एकत्रित हुई थी। दुर्गा वह हर नारी है जो कि अपनी क्षमता से संसार को चकित करती है। दुर्गा वह हर स्त्री है जो कि अन्याय का विरोध कर लेती है। दुर्गा वह नारी है जो कि हमेशा सत्य और धर्म की रक्षा में तत्पर रहती है। जो नारी अपनी आंतरिक शक्ति को पहचान लेती है, वह क्षण भर में दुर्गा बन जाती है। बड़ा सा बड़ा बदलाव दुर्गा रूपी नारी के लिये असंभव नहीं है । 
क्रमशः अगले भाग में
दिवा शंकर सारस्वत ‘प्रशांत’
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