स्त्रियों द्वारा असुरता का प्रचंड विरोध तथा लगातार अपने लक्ष्यों में सफलता प्राप्त करना सिद्ध करने लगा कि स्त्रियां कभी भी पुरुषों से कम नहीं होती हैं। स्त्रियाँ चाहें तो समाज और देश की स्थिति को बदल सकती हैं। वास्तव में विकसित समाज की अवधारणा ही स्त्रियों की शिक्षा तथा स्वावलंबन के सिद्धांतों पर आधारित है। स्त्रियों ने हमेशा समाज के लिये गुप्त योगदान दिया है। पर जब स्त्रियों का योगदान गुप्त के स्थान पर चर्चा का विषय बन जाता है, उस समय एक बदलाव की बहार आती है। नवसृजन का आरंभ होता है। धर्म की पुनः स्थापना होती है।
  देवों सहित भगवान विष्णु को पराजित करने बाले महिषासुर के दरबार में विश्व के विभिन्न भागों से आये असुर त्राहि माम की आवाज कर रहे थे। जिन्होंने कभी भी किसी के जीवन और शील की चिंता नहीं की, नारियों के प्रयासों से विचलित हो गये। दूसरों की रोजी रोटी ही छीनने बाले असुर खुद की रोजी रोटी की दुहाई दे रहे थे। मनुष्यों की लाशों से ही अपनी जीविका चला रहे असुरों की हताशा स्पष्ट थी। उससे भी ज्यादा चिंता की बात थी कि इन असुरों को अपने अपने अधर्म के व्यवसाय से खदेड़ने बाली स्त्रियां ही थीं जिन्हें हमेशा मानसिक और शारीरिक रूप से कमजोर माना जाता है।
  महिषासुर विश्वास ही नहीं कर पा रहा था ।उसे लगा कि शायद स्त्रियों की आड़ में कोई पुरुष ही इन कार्यों को कर रहा है। स्त्रियों में भला इतना साहस कैसे। नहीं। जो दिख रहा है, वह पूर्ण सत्य तो नहीं।
  गुप्तचरों की टोली पता लगा रही थी। पृथ्वी लोक में असुरों की दुर्दशा के पीछे के कारण तलाशे जा रहे थे।
   शीघ्र ही उन स्त्रियों का पता लग गया। विप्र कात्यायन की पुत्री कात्यायनी की महती भूमिका पता चली। फिर निश्चित ही कात्यायन ही वह षडयंत्रकारी पुरुष है। जिन असुरों को देव ही पराजित न कर पाये, उन असुरों को छल से पराजित करना चाहता है। वैसे भी ब्राह्मण देवों के पक्षधर होते हैं। वे ही विभिन्न यज्ञों द्वारा देवों की शक्ति को बढाते हैं। फिर यह निश्चित विप्रों का गुप्त षड्यंत्र है।
  अब इन विप्रों को तथा उनका साथ देने बाली स्त्रियों को उसका फल मिलेगा। असुर सेनानी जल्द ही भूलोक को विप्रों से हीन कर देंगें। और विरोध करने बाली वे स्त्रियां। वे तो वैसे भी संभोग का ही विषय हैं। अपने नेताओं की मृत्यु के बाद वे हमारी कैद में अपना जीवन गुजार देंगीं। हमारे असुर सैनिक नित्य उनके शील को तार तार करेंगें। हाॅ। यही तो उचित रहेगा।
   महिषासुर की गर्जना सुन और स्त्रियों को गुलाम बनाने के लोभ में अनेकों असुर योद्धा चल दिये। मन में उस पशुता के दृश्य देखते हुए जो बहुत शीघ्र ही दिवा स्वप्न सिद्ध होंगें।
  महिषासुर और दूसरे बड़े असुर सेनानी दरबार में प्रतीक्षा कर रहे थे। प्रतीक्षा थी उस पल की जबकि असुर सैनिक कात्यायन तथा दूसरे विप्रों का वध कर विरोध करने बाली स्त्रियों को गुलाम बना इस सभा में लेकर आयेंगे। उनमें से अनेकों कात्यायनी तथा उसकी सहेलियों की सुंदरता की कल्पना में खो गये थे। मन ही मन विभिन्न पशुता के दृश्यों को देख रहे थे।
   अचानक सभी नींद से जागे। जो सैनिक गये थे, उनमें से एक ही वापस आया। उसका पूरा शरीर घावों से भरा था। रक्त से भीगे हुए था। शरीर कांप रहा था। शर्म के कारण बोलने का भी साहस नहीं हो रहा था। पर साहस तो करना ही था। आखिर इसी लिये तो कात्यायनी ने उसे जीवित छोड़ा था। जब प्रयास कर भी बोल न पाया तब उसने कात्यायनी का महिषासुर के लिये लिखा पत्र आगे बढा दिया।
  ” स्त्रियों को शक्तिहीन मानने बाले मूर्ख असुर। हम स्त्रियां अब असुरों की सत्ता को स्वीकार नहीं करेंगीं। अब भूलोक में धर्म की स्थापना होगी। वैसे तुम्हारे कर्म तो इस योग्य नहीं हैं कि तुम्हें जीवित छोड़ा जाये। फिर भी तुम्हें भूलोक छोड़ जाने का अवसर देते हैं। अन्यथा… ।तुम्हारे एकमात्र जीवित रहे सैनिक की दशा तुम्हारे सामने ही है। अब हम स्त्रियां संगठित हो चुकी हैं। अब हमसे टकराने का प्रयास भी मत करना। “
   महिषासुर की गर्जना से एक बार फिर आसमान गूंजने लगा।
” स्त्रियां। यह स्त्रियों द्वारा संभव नहीं। कुछ तो धोखा है। स्त्रियां तो शक्तिहीन होती हैं। पुरुष की दासता के लिये जिनका जन्म होता है, उन स्त्रियों द्वारा यह संहार। निश्चित ही धोखा है। “
” नहीं असुरराज। यह कोई धोखा नहीं। अपितु सत्य है। हम असुर कात्यायन विप्र की कन्या कात्यायनी से ही पराजित हुए हैं। स्वामी। सत्य है कि आज मेरा एक भ्रम ही टूटा। सचमुच कात्यायनी और उसकी सखियाँ अमित शक्तिशाली हैं। एक साथ अनेकों हथियारों से प्रहार करती हैं। लगता है कि मानों कोई आठ हाथों से युद्ध कर रहा हो। शस्त्रधारी तो अनेकों देखे पर कात्यायनी जैसा निपुण कोई भी नहीं देखा।
  स्वामी। सुना है कि ब्रह्मा जी ने भी सृष्टि की स्थापना करने से पूर्व किसी आदिशक्ति नामक देवी की आराधना की थी। कहा जाता है कि विष्णु भी उसी आदिशक्ति के उपासक हैं। आदिशक्ति की अवधारणा सत्य है अथवा कल्पना। पर सत्य है कि कात्यायनी भी भूलोक पर अमित पराक्रमी आदिशक्ति ही है।
   स्वामी। आपको भला क्या सलाह दूं। फिर भी सत्य है कि इस समय स्त्रियों को शक्तिहीन मानने की पूर्व अवधारणा को त्याग देना चाहिये। वास्तव में यदि जीवन प्रिय है तो कात्यायनी की बात स्वीकार कर लेनी चाहिये। “
  घायल सैनिक की बात सुन महिषासुर क्रोध से पागल हो गया।
” मूर्ख सैनिक। अपना ज्ञान मुझे न दो। मेरे समक्ष इस तरह की राय देकर भी यदि तुम जीवित हो तो बस मेरी कृपा से। अब मेरे दरवार से तुरंत चले जाओ। भविष्य में मेरे सामने कभी मत आना। “
   पूरी तरह मिट जाने से पूर्व भी प्रकृति एक बार सृजन का मौका देती है। कंठ तक पाप रूपी नीर में डूबे हुए को भी एक बार बाहर निकल कर पापमुक्त हो जाने का भी अवसर मिलता है। पर सत्य है कि अहंकार में डूबा अधर्मी का मस्तिष्क कभी भी अवसर को पहचान नहीं पाता। वह अधर्म की कीचड़ से निकलने का प्रयास भी नहीं करता है। फिर वही अधर्म का दलदल उसके विनाश का कारण बन जाता है। 
क्रमशः अगले भाग में
दिवा शंकर सारस्वत ‘प्रशांत’
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