खामोश रात का सफ़र
क्या पूरा होता है
कभी
बिस्तर की सिलवटों में
शुरू तो होता है,
कोई लालसा
लेकर आता है
तो किसी को
रुह की तलाश
होती हैं,
किसी को
जिस्म तो मिलता है पर
लम्हों की गर्माहट
फ़ना होती है,
कोई रूह को ही
तलाशता रह जाता है
बस जिस्म से बात होती है,
दोनों ही गुमसुदा हैं
बिस्तर के दो
किनारों में,
कभी तो झाँकते
एक दूसरे के
किनारों पर,तो
ये खामोश रात का सफ़र
मुकम्मल होता
तो शायद
बोझिल दिन का सफ़र भी
आसान हो जाता,
✍️शालिनी गुप्ता प्रेमकमल🌸
(स्वरचित) सर्वाधिकार सुरक्षित
