मौन रहना मेरा अब यही ठीक है
बोल कर कुछ भी ज़्यादा है क्या फायदा
ज़िंदगी मे कभी गर खुशी न मिले
साथ भोगी थी वो अब खुशी न मिले
व्यर्थ जीना है अब हम कहेंगे यही
मिलना था जिससे हमको वही न मिले
मौन रहना मेरा अब यही ठीक है
बोल कर कुछ भी ज़्यादा है क्या फायदा
बन्ध – 2
जिस दिशा मे दिखे गर कोई रास्ता
महके मंज़िल जहाँ है ये वो रास्ता
शर्त है ये कि तुम भी चलो तो सही
मिल ही जायेगा साथी सही रास्ता
मौन रहना मेरा अब यही ठीक है
बोल कर कुछ भी ज़्यादा है क्या फायदा
बन्ध -3 
रास्ते पर चले जाना भी है सही
पर मिले न जो मंज़िल तो क्या फायदा
मौत मिलती हो कल तो मिले आज ही
ज़िंदगी ऐसी पाकर भी क्या फायदा
मौन रहना मेरा अब यही ठीक है 
बोलकर कुछ भी ज़्यादा है क्या फायदा
मौन रहना मेरा अब यही ठीक ये
बोल कर कुछ भी ज़्यादा है क्या फायदा।

नीतेश वर्मा

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