खुद के समक्ष स्त्रियों के हाथों असुरों की पराजय देख शुंभ और निशुंभ दोनों ही भाई क्रोध में पागल हो नारियों का नैत्रत्व कर रही उस युवती की तरफ हाथों में तीक्ष्ण कटार ले भागे। मानों कि उस तलवार से उस नवयुवती के टुकड़े टुकड़े कर देने का ही विचार हो। उत्तर में स्त्रियों ने भी अपने अपने अस्त्र शस्त्र उठा लिये।
” मूर्ख असुरों ।लगता है कि सुधरने का अवसर मिलने पर भी तुम्हारी इच्छा मृत्यु का वरण करने की ही है। वैसे भी मनुष्य अपनी अपनी सोच से ही गति को प्राप्त होता है। जिनकी इच्छा ही दुर्गति प्राप्त करने की हो, उन्हें विधाता भी सद्गति प्रदान नहीं करा सकते। उचित था कि तुम स्त्रियों के सामर्थ्य को समझ खुद धर्म की राह पकड़ लेते। उचित था कि दूसरे असुरों को भी धर्म की राह पर लाते। उचित था कि उस दंभी महिषासुर को भी सही राह दिखाते। पर ऐसा न कर तुम दोनों को तो अपनी मृत्यु ही प्यारी लग रही है। ” युवती के स्वर में इतना तेज था कि दोनों ही असुर एक क्षण को रुक गये। पर सचेत होना कब आसान है। एक बार फिर से उन दोनों दंभियों की ललकार भरी गर्जना सुनाई देने लगी।
” मूर्ख युवती। लगता है कि तुम ही विप्र कात्यायन की बेटी कात्यायनी हो। लगता है कि कुछ मायावी विद्या सीख आयी हो। पर तुम्हें ज्ञात नहीं कि शुंभ और निशुंभ के समक्ष किसी की भी कोई माया नहीं चलती। शुंभ और निशुंभ खुद मृत्यु के पर्यायवाची हैं। मृत्यु खुद जिनसे अभय मांगती है, उन्हीं शुंभ और निशुंभ को मृत्यु का भय दिखाने बाली मूर्ख कात्यायनी। असुरों को अपनी माया से भयभीत करने बाली मूर्ख। अब निश्चित ही तुम्हारे भयभीत होने का अवसर है। हम तुम्हें मृत्युदंड के स्थान पर ऐसी कठोर सजा देंगें कि देखने और सुनने बाले भी कांप जायें। फिर कोई असुरों का विरोध करने का साहस न कर सके। “
दोनों असुर भाइयों की दंभ भरी वाणी सुन वह युवती मुस्करा गयी। दोनों का एक भ्रम तोड़ना आवश्यक लगा।
” शुंभ और निशुंभ। आतताइयों की गणना में हमेशा तुम दोनों का नाम सुनती आयी हूं। तुम दोनों को तो संसार से विदा करना किसी भी साधना से कम नहीं है। वैसे मैं कात्यायनी नहीं हूं। मैं गौरी हूं। तुम दोनों यदि मुझसे बच निकलना तब कात्यायनी जीजी का सामना करना।”
फिर गौरी और शुंभ निशुंभ के मध्य भयानक युद्ध हुआ। उसी समय वीर रस की कविता का गान करते हुए कुण्डला भी वहीं आ गयी। अनेकों स्त्रियां कुण्डला के गान में उसका साथ देने लगीं। महाबली शुंभ और निशुंभ के साथ युद्ध में गौरी का मनोबल बढाने लगीं। एक स्त्री जो तपस्वियों जैसे वस्त्र पहने थी, अपनी तपस्या का फल गौरी को समर्पित कर रही थी। अनेकों माताएं अपनी संतान के प्रति उनकी कर्तव्य निष्ठा का फल गौरी को दे रही थीं।
शुंभ और निशुंभ का प्रत्येक अस्त्र शस्त्र गौरी के सामने निष्प्रभावी हो रहा था। असुर माया युद्ध को विवश हो गये। पर बृह्मचारिणी के प्रयोग से असुरों की माया ही नष्ट हो गयी। प्रत्यक्ष युद्ध में वे गौरी के समक्ष टिक नहीं रहे थे। तथा बृह्मचारिणी के प्रभाव से माया युद्ध में भी असफल हो रहे थे।
आखिर गौरी द्वारा छोड़े गये तीक्ष्ण शरों की वर्षा में दोनों महाबली असुर मृत्यु को प्राप्त हो गये। उन दोनों के मस्तक धड़ से अलग हो गिर गये। देवों को भी अपनी शक्ति से आतंकित करने बाले दो असुर शुंभ और निशुंभ माता पार्वती की अवतार गौरी के साथ युद्ध में मृत्यु को प्राप्त हो गये।
अंतरिक्ष से देव माता गौरी पर पुष्प वर्षा कर रहे थे। दुंदुभि बजाकर माता का यश गा रहे थे।
माता गौरी द्वारा शुंभ और निशुंभ के वध की जानकारी मिलते ही माता कात्यायनी भी वहीं आ गयीं। सत्य तो यही था कि कात्यायनी, गौरी, बृह्मचारिणी सभी एक ही माता शक्ति के अलग अलग रूप थे। अभी असुरों के विरुद्ध युद्ध में माता की और भी शक्तियां अपना योगदान देंगीं।
एक का अनेक हो जाना तथा अनेक का फिर से एक हो जाना जिन शक्तियों की नित्य क्रीड़ा है, उनकी क्रीड़ा निरर्थक तो नहीं। सत्य तो यही है कि वे अनंत शक्तियां आज भी अनंत नारियों के मन में निवास करती हैं।
शुंभ और निशुंभ के संहार की गाथा महिषासुर को सुनाने के लिये एक असुर को छोड़ दिया गया। शुंभ और निशुंभ जैसे महाबलियों के निधन के बाद भी महिषासुर द्वारा धर्म की राह पकड़ना अभी भी कठिन ही लग रहा है।
अहंकार से ग्रसित मनुष्य हमेशा शुद्ध मन से चिंतन करने में असमर्थ रहता है। सत्य को देखकर भी वह उस सत्य को झुठलाता है। फिर कभी भी वह सद्गति को प्राप्त नहीं होता है।
गौरी द्वारा वंदी बनाये असुरों से प्राप्त गोपनीय सूचनाओं के द्वारा नारीशक्तियों द्वारा असुरों के विभिन्न गोपनीय स्थानों पर कार्यवाही हो रही थी। खासकर धर्म प्रचारक के छद्म रूप में छिपे अधर्मी असुर। संत के वेष में छिपे अधर्मियों को वैसे भी समझ पाना बहुत कठिन है।
क्रमशः अगले भाग में
दिवा शंकर सारस्वत ‘प्रशांत’
