किस्से नये पुराने
लगते हैं गुदगुदाने
किस्से नए पुराने
जब भी बैठे फुर्सत में
याद आते हैं
वो मौसम सुहाने
भूले नहीं भुलाये जाते
वो बचपन के जमाने
स्कूल नहीं जाने के 
ढूँढते नित नए बहाने
पूछे जाने पर लगाते
नानी के निधन के बहाने
पकड़े जाने पर पड़ते डंडे
और पड़ते घरवालों की डांट 
भरी दुपहरी में बाग के चक्कर
और जाते खट्टी खट्टी इमली की चाट
डाकिये की साइकिल 
ले जाते सीखने के बहाने
पर सीख तो नहीं पाते
पर लगा आते चोट
डाकिया कहता -ये तो होना ही था
जब इसकी नीयत में था खोट
कान पकड़ कर सॉरी कह
चुप जाते माँ के आँचल की ओट
ज्यों हुए कुछ बड़े तो
चढ़ा था इश्क का बुखार
एक अनजाने से कर बैठे
अनजाने में ही प्यार
बस अब तो करते रहते
हर वक़्त उसका ही इंतजार
पर हाय री किस्मत 
मेरे नसीब में नहीं था उसका प्यार
छोड़ गया मुझको तन्हा रोते
आया न जुल्मी कभी आँसू पोंछने
उतार फेका सर से इश्क का बुखार
अब तो बस खुद से ही है करना प्यार
कल्पनाओं को बस देकर रंग
जीवन में बढ़ाना है उमंग
दिल गाये ख्वाबों के तराने
करके याद किस्से नए पुराने…..
                      नेहा शर्मा
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