लक्ष्मी निलयम् हमारा घर, हमारा घरौंदा जिसकी बाहों में दुबक कर मिलने वाला सुख अप्रतिम है, कण कण में हमसब और लक्ष्मी निलयम् आपस में रचे बसे, कितने भी दूर चले जाओ पर हल्की सी याद कर लक्ष्मी निलयम् में ही हम अपनेआप को पाते हैं ।
लक्ष्मी निलयम के बड़े दरवाजे की ओट में लगा गुलाब का पेड़ अपनी खूबसूरती और खुशबू से सबको अपने खिलखिलाते सौंदर्य से आकर्षित कर ही लेता है।
गेट पर कदम रखते ही प्रत्येक आगंतुक का शालीन स्वागत गुलाब ही करता है ।
तरह-तरह के पेड़ पौधों को पनपने और खिलने का पूर्ण आनंद प्रदान किया है पिताजी ने लक्ष्मी निलयम् में ।
पेड़ पौधों के साथ दिनचर्या में रंग भरते पिताजी अधिकतर चाय भी अपने बगीचे में पीना पसंद करते हैं ।
अधिकतर सुबह की चाय बना लेने पर ,अम्मा पिताजी को चाय पीने के लिए बुलाने के लिए ,बगीचे में ही आती हैं ।
दोपहर में भी पिताजी खाना खाने के बाद गर्मियों में पेड़ों की प्यास को महसूस कर पेड़ों को पानी देकर पेड़ों की प्यास शांत करते हैं ।
कहने को तो अमरूद का एक ही पेड़ है ,पर जब उस पर फल लगते हैं तो उसकी डालियां फलों से लद कर प्रसन्नता से धरती को चूम चूम कर आभार व्यक्त करती सी प्रतीत होती हैं ।
अमरूद के फलों की सुगंध से पक्षी अपने को निमंत्रित सा पाते हैं ,अमरूद के सबसे मीठे फल को चखने का सौभाग्य तो तोतों को ही मिला हुआ है ,लगता है ,अमरूद और तोतों की कोई सांठगांठ है की सबसे मीठे फल सबकी पहुंच से दूर सबसे ऊपर लगते हैं ,जिसको तोते आराम से शिखा पर बैठकर खाते रहते हैं ।
अमरूद के पास में लगा करौंदा का पेड, जिससे अम्मा का विशेष लगाव है ,क्योंकि उस पेड़ की पौध अम्मा अपने मायके पीलीभीत से लाई है ,वह पौध नाना जी के हाथोें लगाए गये करौंदे के पेड़ की ही पौध है ।
जब करौंदे का पेड गर्मियों में लाल सफेद करौदों से पूर्णतया लद जाता है ,तो हरी दुशाला पर सफेद लाल मोती की तरह लगे चंद्र मोती की तरह अनमोल सौंदर्य का विस्तार करते हैं ।करौंदों की छत्रछाया में पनप रहा सदाबहार भी अपने को सौंदर्य का उपासक समझता है ।
अमरूद के पेड़ पर वैसे तो दिन भर चिड़ियों का स्थाई निवास अपनी विकास परंपरा का उद्घोषक है ,पर कभी-कभी मधुमक्खियों को भी छत्ता बनाने का मोह जाग जाता है ।
अमरूद के पेड़ के नीचे बना पानी का टैंक कितनी मनमोहक यादों से परिपूर्ण है होली पर पानी से भरे टैंक में रंगों को घोल देना और पूरा मोहल्ला भर भर बाल्टी एक दूसरे पर रंगों की बौछार करते हुए दृश्य को याद करना खुद को आनंद रस में लिप्त करना है ।
अमरूद के नीचे पानी के टैंक की बात हो और उसमें अनु की बच्चों के साथ खिलंदड़ी का जिक्र ना हो तो कुछ खाली खाली सा लगता है ।
टैंक का एक ढक्कन खोल कर अन्नू पानी की बाल्टी से पानी निकालते और चारों तरफ घर के छोटे बच्चे निशी, अंशु, गुन्नू,तन्नूको बैठा कर उन पर बारी-बारी से भर भर पानी की बाल्टी लौटने का आनंद बड़े-बड़े स्विमिंग पूल में भी आनंद भरा आनंद दुर्लभ है।
कमरों की खिड़कियां बगीचे में खुलती है ,तो खिड़कियों की झाप पर भी गमलों में कैक्टस के तरह-तरह के बूटे अपना कब्जा गमलों में जमाए हुए लगते हैं ।
नींबू ,अंजीर और मौसमी के फलों से लदे हुए छोटे छोटे पेड़ अपनी जीवंतता और देने की परंपरा की उद्घोषणा करते हैं ।
बेलों को भी ऊंचाई पर चढ़ने के लिए ,लक्ष्मी निलयम का बगीचा बहुत भाता है ,पर वह सौंदर्य की छटा बिखेरने के लिए ऊपर चढ़ती है ,पर छत पर फैलनाउन्हें पसंद नहीं । तरह-तरह के फलों के ,पेड़ पौधे अपनी फलों की सुगंध से पक्षियों को बुलाते से प्रतीत होते हैं ।
लक्ष्मी निलयम की लंबी गैलरी में दोनों और लगे गमले अपने प्राकृतिक वैभव से संपन्न निरीह भाव से चहचहाहते हुए,अपने चुलबुले पन से स्वागत उत्सुक दिखाई देते हैं ।पेड़ पौधों के साथ पक्षियों का भी आत्मीयता का रिश्ता हो गया है ।
हां जब बगीचे में चिड़ियों के लिए दाना डालते हैं पिताजी तो चिड़िया वहां आराम से दाना खाती रहेगी और वहां कोई भी टहल रहा हो ,पर चिड़िया अपना पूर्ण आधिपत्य समझ निर्भय हो शांति से बैठ कर दाना चुगती रहती है ।
लक्ष्मी निलयम् में शरद ऋतु में महकता हरसिंगार अपनी मनमोहक मादक खुशबू से शाम से ही घर के आगे से निकल रहे लोग की गति को स्थिर गति सा करताप्रतीत होता है ।
पूरा घर रात भर हरसिंगार के पुष्पों की सुगंध से आच्छादित हो कर मन को ताजगी प्रदान करता है ।प्रातः काल हीं फूलों की चादर को धरती पर फैला कर हरसिंगार का वृक्ष आराम करता है ।
हरसिंगार की खुशबू का सौंदर्य वर्ष भर मन को आनंदित करता है।
मनी प्लांट की वैराइटी अपनी चमक से उद्घोषणा करती है कि पिताजी ने कितनी तन्मयता और भाव विभोर हो उनकी परवरिश की है।
वैसे तो लक्ष्मी निलयम् में तुलसी की पूजा नित्य पूजा का अंग है, पर कार्तिक मास में बगीचे के बीचो-बीच तुलसी के गमले के पास जमीन पर बैठकर कार्तिक की कहानियां पढ़ना और भजन, कीर्तन और आरती करना अद्भुत शांति प्रदायक होता है।
औषधीय गुणों से भरपूर करी पत्ता अपने विकास की गति से अन्य सभी पेड़ों को मात देने का अपना मंसूबा प्रकट करता है ।नवागंतुक की श्रेणी में अंजीर और शहतूत आते हैं।
प्रतिस्पर्धा का भाव शायद इन पेडो में भी होता है ,शायद शहतूत इसी भाव से मानो सब की ऊंचाई को लांघ गया है। ऊंचाई में उसने अमरूद और हरसिंगार को भी पीछे छोड़ दिया है ।
गेट पर रात की रानी तेज महकती है ,और अंधेरी रात में भी लक्ष्मी निलयम् का पता अपनी तेज गंध से बताती रहती है। बहुत याद आते हैं वो प्यारे प्यारे दिन ,जब छोटी-छोटी अप्पू सुब्बी और सब बच्चे हरसिंगार के नीचे बैठ जाते थे, पिताजी हरसिंगार के पेड़ को हिलाते और हम सब फूलों की बारिश में नहाते थे।
हां लक्ष्मी निलयम् के प्राकृतिक सौंदर्य के साथ घर की दहलीज पर बनी जानवरों के पीने के लिए पानी की हौद बनवाने की अनिवार्यता हमारी अम्माजी (दादी )की रही, हम हरियाणा वासियों के घरों के दरवाजे पर जानवरों के लिए पानी की हौद तो जरूर बनवाते हैं ,यह हम लोगों के घरों की एक तरीके से पहचान है ,तो अम्माजी के कहने पर प्यासे जानवरों के लिए हौद बनवाई गई, जिसको पिताजी रोज सुबह साफ सुधरा करके पानी भरते हैं और प्यासे जानवर भी पूरी उम्मीद से आकर पानी पीते है, गर्मियों में तो पानी की हौद तीन तीन बार भरते हैं पिताजी,यह सब करके पिताजी को बहुत अच्छा लगता है ,पर एक शरारती कालू कुत्ता आकर तो उसमें बैठकर चरम सुख का अनुभव करता है ।
गुडिया के संस्मरण
जया शर्मा प्रियंवदा
