जाने कब ये लड़का शादी करेगा। तीस का होने चला.. अच्छी भली नौकरी है।एक से एक रिश्ते ठुकरा कर जाने क्या खोज रहा है। अपनी किट्टी से आकर शक्ति जी भुनभुना रही थी।
क्या हो गया माँ.. आते ही किस पर गुस्सा हो रही हो.. वही हाॅल में अपने लैपटॉप पर काम करता शिवम पूछता है।
अपनी किस्मत पर गुस्सा हो रही हूँ। मेरी उम्र की मेरी सारी सहेलियाँ पोते पोती वाली हो गई और मैं। रश्क होता है उनकी किस्मत पर मुझे.. शक्ति जी सोफ़े पर बैठती हुई कहती हैं।
क्या माँ.. जब होनी होगी.. शादी भी हो जाएगी.. शिवम माँ की तरफ पानी का गिलास बढ़ाता हुआ सर्द आवाज कहता है।
क्या है शिवम… ऐसे भी कोई करता है क्या। अकेले घर काट खाने को दौड़ता है.. क्यूँ नहीं समझता है तू.. शक्ति जी की आवाज बेबसी झलक रही थी।
शिवम बिना कोई उत्तर दिये काम में लगा रहा।
अच्छा सुन कल मैं और मेरी सहेलियाँ अनाथालय जा रहे हैं। हम लोगों ने सोचा इधर उधर पैसा फेंकने से अच्छा है किसी के काम आ जाए.. शक्ति जी उत्साहित होकर बेटे को बताती हैं।
ये तो आप लोगों ने बहुत ही अच्छा सोचा माँ.. गर्व है आप पर मुझे.. शिवम काम छोड़ माँ का हाथ अपने हाथ में लेता हुआ कहता है।
छोड़ मस्का मत लगा..नाराज तो अभी भी हूँ तुझसे.. शक्ति जी बोलती हुई हाथ छुड़ा अपने कमरे की ओर बढ़ जाती हैं।
नाम क्या है तुम्हारा बिटिया.. एक लड़की जो अनाथालय में बच्चों को पढ़ा रही थी उससे शक्ति जी ने पूछा। 
जी.. गौरी.. बोल लड़की मुस्कुराई। 
सूती कपड़े का ढ़ीली ढाली सलवार कमीज पहने.. बालों को ऊपर उठा कर बाँधी हुई वो गेहूँए रंग की लड़की से पल भर में मोह हो गया उन्हें। 
जब तक अनाथालय में रही.. गौरी के बारे में ही जानने की कोशिश करती रहीं। 
इसी अनाथालय में पली बढ़ी.. एक मल्टीमीडिया की पढ़ाई कर अच्छे प्रतिष्ठित चैनल में सम्पादक के पद पर कार्यरत थी। 
उस अनाथालय से या यूँ कहे कि शक्ति जी गौरी संग स्नेह की डोरी से ऐसे बँध गई कि लगभग प्रतिदिन जाने लगी और गौरी भी उनके ममता के आँचल से बँध गई कि बिना नागा फोन पर भी जरूर बात करती। 
इसी तरह छः महीने गुजर गए। शक्ति जी ने अपने बेटे से अनाथालय का जिक्र करती थी लेकिन कभी उन्होंने गौरी का जिक्र नहीं किया था। 
जी.. मैं गौरी.. देवांश अनाथालय से.. आप शिवम जी हैं ना.. गौरी ने फोन पर ही बहुत व्यग्रता सा पूछा। 
जी.. शिवम बोल रहा है.. देवांश अनाथालय सुन शिवम सचेत होता हुआ बोलता है। 
जी.. शक्ति आंटी फिसल कर गिर गई हैं.. हम उन्हें अस्पताल ले आए हैं.. आप जल्दी पहुँचिए.. गौरी हड़बड़ाती हुई कहती है। 
कैसे गिरी.. पूछते वक़्त शिवम की आवाज ऊँची हो गई।
जी.. वो हमने होली का प्रोग्राम रखा था तो बच्चों संग होली खेलती हुई आंटी फिसल गई।
अरे तो ध्यान रखना चाहिए था ना.. कितनी बार कहा है कि रोज़ रोज मत जाओ.. आता हूँ मैं.. झुंझलाते हुए शिवम बोलता है और उधर से बिना कुछ सुने कॉल डिस्कनेक्ट कर देता है।
परिचारिका शक्ति जी को दवा खिला रही होती है कि इतने में रिसेप्शन पर कमरा पूछ जल्दी जल्दी सीढ़ियाँ फलाँगता शिवम कमरे में पहुँचता है।
माँ का हाथ अपने हाथ में ले शिवम वही बगल में रखी मेज पर बैठ जाता है।
कैसी हैं माँ.. कितनी बार कहा है कि अपना ख्याल रखा करें.. ज्यादा चोट तो नहीं है ना.. एक ही साँस में शिवम पूछता है।
साँस तो ले ले.. ठीक हूँ मैं ।रिपोर्ट थोड़ी देर में आ जाएगी.. शक्ति जी बताती है।
और ये गौरी कहाँ है.. यहाँ पहुँचा कर कहाँ गायब हो गई। मिल जाए तो उसे इतना सुनाऊँ.. शिवम क्रोधित होकर बोलता है।
क्या सुनाएगा उसे.. उसी के कारण तो..
क्या उसी के कारण ये दर्द मिला आपको.. है ना.. शिवम शक्ति जी की बात काटता हुआ कहता है।
सुन बेटा.. शक्ति जी बोल ही रही थी कि दवाइयों का थैला लिए एक लड़की अंदर आती है।
ढीली ढाली कत्थई रंग की सूती सलवार कमीज.. ऊपर चढ़ा कर बांधे गए बाल और कत्थई रंग की ललाट पर चमकती बिंदी.. शिवम उसे देखता रह गया।
आप शिवम जी.. दवाइयों का थैला रखते हुए गौरी ने बेहिचक अभिवादन करते हुए शिवम से पूछा। 
जी.. शिवम के हाथ भी नमस्कार की मुद्रा में जुड़ गए। 
ये गौरी है बेटा. शक्ति जी मुस्कुराते हुए कहती हैं। 
जो शिवम अभी तक तुनक रहा था.. जिस शिवम ने कभी लड़कियों को नजर उठा कर नहीं देखा था.. आज उस शिवम की नजरें बग़ावत पर उतारू थी। गौरी को बिना पलक झपकाए शिवम देख रहा था.. कुछ सुनाना तो अब दूर की बात थी। 
शक्ति जी की रिपोर्टस भी समान्य थी। बस कमर के पास वाली नस गिरने से हल्की सी दब गई थी। तो डॉक्टर ने दवाइयों के साथ आराम की सख्त हिदायत देकर और अगले सप्ताह फिर से जाँच के लिए आने कह अस्पताल से छुट्टी दे दी थी।
गौरी और शिवम उन्हें सहारा देकर कमरे तक ले जाते हैं।
बिटिया अब तुम घर जाओ.. शक्ति जी कहती हैं।
पर आप अकेली.. गौरी चिंताकुल शब्दों को व्यक्त करती है।
कौशल्या है ना… अपनी घरेलू सहायिका की ओर इशारा करती हुई शक्ति जी कहती हैं।
बस तुम आती जाती रहना और कभी कभी बच्चों को ले आना.. तुम लोग के बिना मन नहीं लगेगा मेरा.. शक्ति जी गौरी से कहती हैं।
शिवम जा इसे घर पहुँचा आ.. रात हो रही है… शक्ति ही अपने बेटे से कहती हैं।
जो मूक सा हुआ गौरी को ही देखे जा रहा था।
आं हाँ माँ.. बोल बाहर निकल जाता है।
उसके पीछे पीछे गौरी भी आती है और शिवम को दरवाज़ा खोल खड़े देख चुपचाप सीट पर बैठ बेल्ट लगा लेती है।
गौरी जी.. फोन पर जोर से बोल देने के कारण माफ़ी चाहता हूँ.. शिवम गाड़ी चलाते हुए बोलता है।
जी.. कोई बात नहीं.. कोई भी बच्चा ऐसी ही प्रतिक्रिया देगा.. गौरी सामने देखती हुई जवाब देती है।
बस यही रोक दीजिए.. मेरा घर आ गया.. गौरी बोलती है।
शिवम के गाड़ी रोकते ही धन्यवाद बोलती हुई गौरी उतर जाती है और अपने घर की ओर बढ़ जाती है।
शिवम मुस्कुराता गुनगुनाता घर पहुँचता है और माँ से गौरी के बारे में देवांश अनाथालय के बारे में सब कुछ पूछता है।
आप यहाँ कैसे..दो दिन बाद ही रविवार के दिन शिवम को अनाथालय में देख गौरी आश्चर्य से पूछती है।
माँ सबका हाल चाल जानना चाहती थी इसीलिए मैं आ गया.. शिवम झूठ बोल जाता है।
अच्छा.. कल ही तो आंटी से मिल कर आई हूँ मैं..आप बैठिए… मैं बच्चों को पढ़ा कर आती हूँ.. गौरी बोलती है।
गौरी जी.. मेरा आपके लिए एक प्रस्ताव था.. रूकते हकलाते हुए शिवम बोलता है।
मेरे लिए क्या.. गौरी के माथे पर बल पड़ जाते हैं।
मैं कह रहा था कि तीन दिन बाद होली है। माँ यहाँ तो नहीं आ सकेंगी। क्यूँ ना आप बच्चों को लेकर वही आ जाए. सब मिल कर होली खेलेंगे.. शिवम कहता है।
पर उस दिन तो आप.. गौरी कहती है।
माफ़ी तो माँग चुका हूँ उस दिन के लिए ना.. शिवम मनुहार करता हुआ कहता है।
ठीक है..ले आऊँगी मैं.. गौरी मुस्कुरा कर कहती है।
लेकिन आपको रोज तैयारी के लिए घर आना ही होगा.. शिवम गौरी के आँखों में आँखें डाल कह बैठता है।
गौरी उसके बोलने के बदलते अंदाज पर चौंक कर देखती है तो आँखों में कोई और प्रस्ताव देख नजरें फेर लेती है और अपनी धड़कनों को व्यवस्थित करने की कोशिश करने लगती है।
मैं चलता हूँ.. गौरी कुछ बोलती उससे पहले ही शिवम चाभी घुमाता मुस्कुराता हुआ चला जाता है।
अब रोज गौरी के दफ्तर पहुँच उसका इंतजार और घर आकर उसके साथ होली की तैयारी करना ही शिवम का काम रह गया था।
घर के लाॅन में ढ़ेर सारी तैयारी की थी शिवम ने.. हर तरफ कत्थई रंग के फूलों की सजावट थी।
शिवम जी सजावट की तो कोई बात नहीं हुई थी.. गौरी सजावट देख पूछती है।
तुम्हारे लिए सरप्राइज था मोहतरमा.. गौरी के कान में शिवम फुसफुसाता है और शिवम के मुँह से तुम के संबोधन से गौरी के गाल शर्म से दहकने लगते हैं और धड़कन फिर से बेकाबू हो जाती है।
मैं आई.. बोल गौरी वहाँ से हट जाती है और शिवम बच्चों के साथ मस्ती करने में मशगूल हो जाता है।
तो मिस गौरी.. क्या आप मेरी अर्धांगिनी बनना पसंद करेंगी.. हाथों में कत्थई रंग के फूलों का गुलदस्ता लिए बच्चों के बीच घुटनों के बल बैठकर शिवम गौरी से पूछता है।
गौरी अचानक आए इस प्रस्ताव से व्यथित हो जाती है.. हाँ या ना बोलते नहीं बनता है।
तुम्हारे मन के सारे सवाल के जवाब तुम्हें मिल जाएंगे.. तुम्हारी सारी जिम्मेदारी अब मेरी.. बच्चों को खुद में समेटते हुए शिवम कहता है।
बोल दे बिटिया हाँ.. इस दिन के लिए कब से इंतजार कर रही थी मैं.. मुझे पता होता कि मेरे गिरते ही इस पर प्रीत का रंग चढ़ जाएगा तो छः महीने पहले ही गिर जाती मैं तो.. दादी की आँखों में जो खुशी की बदली छाई थी.. अब वो बरसने के लिए तैयार थी।
पर गुलदस्ते में सिर्फ कत्थई रंग के ही फूल क्यूँ? हया की लाली के साथ हाँ कहते हुए फूलों का गुलदस्ता लेती हुई गौरी के मुँह से बेसाख्ता ही निकल जाता है।
क्यूँकि उस दिन अस्पताल के कमरे में जब आप आई थी तो वो कत्थई रंग ही था.. जिसने मुझ पर जादू चलाया था और मुझे तुम्हारे प्रीत के रंग में रंग गया.. शिवम ये बोलता हुआ गौरी के आँखों में देखता है और दोनों को एक दूसरे की आँखों में सिर्फ प्रीत के रंग ही दिख रहे होते हैं। 
आरती झा(स्वरचित व मौलिक) 
दिल्ली 
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