मदालसा बचपन को पीछे छोड़ यौवन की अगवानी कर रही थी। गंधर्व लोक की बेटियां बैसे भी बहुत सुंदर होती हैं। पर मदालसा तो सौंदर्य की देवी रति का ही अवतार लगती। हालांकि उसके रूप का सौंदर्य उसके गुणों के सौंदर्य के समीप कुछ भी न था। रूप भले ही ईश्वर प्रदत्त हो पर गुण तो स्व प्रयोग से अर्जित होते हैं। कुण्डला के सामीप्य ने मदालसा को गुणों के उस उच्च शिखर पर पहुंचा दिया था, जहाँ से वह अनेकों को सही राह दिखा सकती थी। संसार में रहकर भी संसार से विरक्ति का पाठ पढा सकती थी। वैराग्य पथ की प्रेम कहानी की नायिका बन सकती थी। पर सत्य तो यह भी है कि मानसिक गुण कभी भी किसी को आसानी से ज्ञात नहीं होते। जैसे अपनी नाभि में कस्तूरी रखा हुआ मृग बहुधा जानता ही नहीं है कि उसका अंतःकरण कितना अमूल्य है। मृग जहाँ भी जाता है, अपनी गंध से वातावरण को सुगंधित करता जाता है। पर वही मृग उस सुगंध के उद्गम स्थल का पता लगाने को विह्वल रहता है।
  माता आदिशक्ति की आज्ञा से कुण्डला ने बहुत समय पृथ्वी लोक पर व्यतीत किया था। बचपन से ही मदालसा कुण्डला के मुख से पृथ्वी लोक की कहानियाॅ भी सुनती आयी थीं। भले ही स्वर्ग का सौंदर्य बहुत ज्यादा श्रवण का विषय रहता है। पर स्वर्ग निश्चित ही वह स्थल तो नहीं, जो वैराग्य मार्ग की पुजारिन के मन को लुभा सके। पृथ्वी पर कुछ तो है जो यह पृथ्वी हर बार विभिन्न मनीषियों को अपनी तरफ आकर्षित करती है। अनेकों संतों की कर्मभूमि बनती रही है। कितने ही भक्तों की भक्ति की कहानियों की जननी है। दानी और धर्मी के रूप में सुने जाते सभी इस पृथ्वी के ही तो निवासी थे। बहुत क्या कहा जाये, पृथ्वी तो स्वयं भगवान को इतनी प्रिय है कि वह भी बार बार पृथ्वी पर ही अवतार लेते हैं। माता कात्यायनी की क्रीड़ा भूमि है।
   वैसे बचपन में वह भी कभी कभी कुण्डला के साथ पृथ्वी पर विचरने आयी थी। मुनियों की तपोभूमि में मदालसा के मन को एक अलग ही आनंद मिलता था। अब किशोरावस्था के अवसर पर मदालसा खुद इतनी समर्थ थी कि अपनी इच्छानुसार धरती लोक पर विचरण कर सकती थी। फिर भी कुण्डला की बतायी सावधानी अक्सर वह ध्यान में रखती। प्रायः रात्रि काल में ही किसी निर्जन प्राकृतिक स्थलों का अन्वेषण करती। 
  कल कल करती बहती नदी से पूछती उसकी गतिशीलता की बजह। नदी भी उत्तर देती – संसार की प्यास बुझाने को। मैं रुकती नहीं। यदि रुक गयी तो संसार प्यासा रह जायेगा। फसलें सूख जायेंगी। 
   मदालसा का अंतःकरण देखता कि नीर का भंडार होते हुए भी खुद एक बूंद भी खुद के लिये नहीं। मन की बात वाणी का रूप रख लेती। धन्य हो नदी तुम। जगत के लिये हमेशा गतिशील रहने बाली। 
   फलों से लदे तरुओं को देख उनसे प्रश्न करती। 
  ” नदी तो गतिशील है। पर तुम क्यों अकड़े खड़े हो। इन फल संपत्ति का क्या करते हों।” 
  तरु भी मदालसा की नादानी पर मुस्कराने लगते। 
  ” गंधर्व कन्या। सब प्रकृति के वश में हैं। नदी की गतिशीलता उसकी प्रवृत्ति है। और हमारा जड़ होना हमारी प्रवृत्ति। पर सत्य है कि हम एक भी फल नहीं खाते। हमारी जड़ जैसी देह आसरा बनी हुई है अनेकों परिंदों और छोटे जीवों का। फल दुनिया की भूख मिटाते हैं। हम खुद तो धरती की चट्टानों को भी तोड़ धरती से ही अपना भोजन ले लेते हैं। यह स्वाद बस दुनिया के लिये। “
  मदालसा के मुंह से निकलता -” धन्य हो तरुओं। दुनिया के लिये खड़े खड़े जीवन बिता देते हों। सारे स्वादिष्ट फल दुनिया को लुटा देते हों। खुद खड़े रहकर छोटे जीवों का बसेरा बनते हों। “
  नदियों, तरुओं, वनों, पर्वतों, मंद मंद बहती हवा, फूलों, तितलियों, भ्रमरों में वैराग्य और अध्यात्म की कहानियों को तलाश रही गंधर्व राजकुमारी जानती ही नहीं थी कि वह खुद एक बड़ी वैराग्य की कहानी की नायिका है। जिस वैराग्य को वह पृथ्वी पर ढूंढ रही है, वह वैराग्य तो उसके अंतर्मन में बचपन में ही अंकुरित हो चुका है। कुण्डला के साथ सत्संग की खाद पाकर कब का एक विशाल वृक्ष बन चुका है। 
  दूसरी तरफ मदालसा यह भी नहीं समझती थी कि एक स्त्री का मानस प्रेम की बहती सरिता होता है जो अपना लक्ष्य पहचान लेता है। वास्तव में नदी की गतिशीलता का दूसरा अर्थ उसका प्रेमी हृदय भी है जो उसे लगातार उसके प्रेमी सागर की तरफ बहाये ले जा रहा है। आयु के इस भाग में  मदालसा के अंतःकरण में वैराग्य के घने वृक्षों के मध्य छिपा एक स्त्री का प्रेम भी चुपचाप बाहर निकलने की प्रतीक्षा कर रहा था। मदालसा से कहना चाह रहा था कि मुझसे इतनी नाराजगी क्यों। एक बार मुझपर भी तो विश्वास करो। मैं एक कन्या के मन की प्रेम दशा, मुझसे क्या छिपा हुआ है। मैं ही तो साधन हूं जो साधक को ऊपर उठाता है। मैं वही प्रेम हूं जिसके वशीभूत होकर ही कितने भक्त भगवान को प्राप्त हुए। यदि मैं न होता तो भक्त और भगवान का मिलन भी न होता। मैं वही प्रेम हूं जो न केवल विश्व को जीना सिखाता हूं अपितु उन्हें आगे भी बढाता हूं। जिस वैराग्य को तुम खोज रही हो, वह तुम्हारे नजदीक होते हुए भी बहुत दूर है। आखिर अभी तक तुम मेरी अवहेलना जो कर रही हो। पर अब अवहेलना कर नहीं पाओंगीं। आज जिस गोमती नदी के किनारे तुम भ्रमण कर रही हों, आज यहीं तुम मुझसे परिचित होने बाली हों। प्रकृति अनुरूप है। उसी प्रकृति की सुंदरता में भूली भले ही तुम्हें सूर्योदय होने का भान नहीं है। पर मुझे भान है कि यही उचित समय है जबकि मुझे सूक्ष्म से विशाल बनना है। अंतःकरण के अंधेरों से बाहर निकल तुम्हें खुद का परिचय देना है। विधि का विधान मिटता नहीं है। तुम्हारे प्रेम का विधि निर्मित पात्र राजकुमार ऋतुधव्ज भी आ चुका है। फिर अब मेरे प्रगट होने का समय आ चुका है। निश्चित रहो गंधर्व राजकुमारी। मैं तुम्हारा पतन नहीं होने दूंगा। तुम्हें वैराग्य पथ की कहानी की नायिका मैं ही बनाऊंगा। आखिर मैं प्रेम हूं। कोई बासना तो नहीं। 
क्रमशः अगले भाग में
दिवा शंकर सारस्वत ‘प्रशांत’
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