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मिले वो जो हमसे सनम ,
    प्रेम हमसे भी दूजा रहा।
सात वचनों में बंधकर चल दिया , प्रथम राष्ट्रहित में समय बहल गया
वो प्रेम की निशानी मुझे दे गया,
     गहरे समंदर में कही खो गया ।
वीर बनाना तुम मेरे अक्ष को ,
   मां भारती को वचन दे गया।
आंसुओ का दरिया वही सुख गया   मातृभूमि चरणों में मन बंध गया ।
प्रेम की निशानी दिल संभल गया ,
इतनी दुनियादारी मन सहम गया।
सर्वप्रथम राष्ट्र अर्चना हो स्वयं ,  देशहित में रश्मि सा मन सवर गया
चाहतों के पुष्प चढ़ाते रहें ,
      राष्ट्र वंदना गीत गाते रहे।
अपनी रश्मि…..
स्वरचित मौलिक १४ जी
रश्मि गुप्ता रिंकी (जिला खरगोन मध्य प्रदेश)
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