ये भी हम जैसा है छोटा,
चंचल और मस्त कलंदर।
नहीं जानता हेरा फ़ेरी ये ,
ना है झूठ ही इसके अंदर।
भूख लगे तो पूँछ हिलाता,
रूखा सूखा सब खा जाता।
वफ़ादारी का नाम श्वान है।
दुश्मन इससे बच ना पाते,
बडे़ दर्द क्या इसका जाने?
चलो हमीं उपचार करेगें।
ये छोटा हम भी हैं छोटे,
पट्टी ज़ख्मों पे हमीं धरेगें।
ये भी हम जैसा दिखता है।
गली का ठेकेदार है लगता ।
ये भी आज से दोस्त हमारा,
बोलो बहना! क्या कहती हो?
ठीक है भैय्या ले चलते हैं,
दो से तीन की हुई ये टोली।
मस्ती खूब करेंगे मिलकर,
कभी किसी से नहीं डरेंगे।
मनमौजी ही सबसे प्यारा,
नाम रखेंगे आज से इसका।।
           रचयिता –
                सुषमा श्रीवास्तव
मौलिक कृति,सर्वाधिकार सुरक्षित, रुद्रपुर, उत्तराखंड।

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