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जाने कैसा कहर है ये जो दुनिया पर है छायी
हर ज़िन्दगी के लिए ही बेचैनी बनी आज साथी
नहीं कुछ आसान करना कैसी है ये लाचारी 
विचलित मन हो उठता है देख हर चीज़ की महंगाई
चलता नहीं ब्यापार ठीक से न चले व्यवसाईं
कैसे चलाये घर अपना सोच कर हारे बेरोजगारी
आमदनी तो होती नहीं कैसे ख़रीदे दाल व अनाज़ हम भाई
ज़मीं छोड़ कर आसमान छू रही आज देखो महंगाई
पट्रोल की भाव हुए सौ गुना ज्यादा महंगा 
चले भी तो अब मुश्किल से रास्ते पर कोई संवारी
तेल व नमक की बात ही दूर ए वक़्त ज़ालिम
छोटी छोटी फल और सब्ज़ीओ को भी तोल दी ये महंगाई
हर कोई चाय के दीवाने है हर घर की कहानी है
मिले दूध भी आग की भाव मे सबकी उडी हवाई है
चेतन से हर चीज़ पकाने लगे गैस की जैसे हड़ताल हुए
किसी को नहीं छोड़ा सबको बहा लेगया ज़ालिम ये महंगाई
एक तरफ है ज़िन्दगी पहाड़ सा दूजा मुश्किल हज़ार है
कैसे करेंगे खरीदारी घर की सोच हर कोई जाता बाजार है
कैंसे नज़र मिलाये ज़िन्दगी से जो चिंता की शिकार हुए
हर चीज़ पर बज्र फैलाये बैठा गया है ये आग सी महंगाई 
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नैना… ✍️✍️
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