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एक ज़माना था कभी
ज़ब एक देश मे एक राजा हुआ करते थे
न कोई मतभेद ना कोई षड़यंत्र
हर प्रजा खुशहाल जिया करते थे
बदला वक़्त बदलते मौसम की तरह
बाँट लिया लोगो ने ही आपस मे
पृथ्वी माँ की आँचल को
हर शहर मे एक राज्य बना
हर किसी के विचार मे मतभेद का पहरा बना
बाटने लगे अपने ही लोग
आपस मे रिश्तों की अहमियत
अपने ही स्वदेश को कयी टुकड़ो मे बाँट लिया
क्या ज़माना था वो भी ज़िन्दगी का
ज़ब वीरो ने स्वदेश को
गुलामी से अपने दम पर मुक्त कराया था
गौरव है वो स्वदेश की
जिन्होंने ने एक से एक संस्कृत व
अपने अपने मातृभूमि के लिए
अपनी जान हँस हँस कर गवाएं
आजकल के ज़माना
खुद के सम्मान के लिए लोग
सच्चाई को भी झूठा साबित करने लगे है
जिस सरकार से जनता
खुशहाल ज़िन्दगी जीया करता है
उसे ही बुराई की शक्ल देकर
बेगुनाओ को भी गुन्हेगार साबित करने मे
जाने क्यूँ लोग भूल जाते है
ये जो राजनीति की ज़हर जो है
इसका असर पुरे देश पर होता है
कोई अच्छा इंसान गर राज्य सम्भालता है
तो पूरी राज्य मे हर दिन होली 
और हर रात दीपावली की तरह बीतता है
खुद के शान व रुतबे के लिए
स्वदेश की हर किसी को जिना हराम करना
कहाँ की समझदारी है इंसान की
एक परिवार मे सबके लिए
माता पिता की छाया व देखभाल से
उस घर के बच्चे से लेकर बड़े भी
खुशी व प्रेम से जीवन व्यतीत करते है
उसी तरह स्वदेश के लिए
सच्चा व नेकदिल राजा का होना
ईश्वर की एक आशीर्वाद की तरह होता है
जिनके परिश्रम और सच्ची न्याय से
पूरा देश संतुष्ट रहता है
ज़ब सरकार ही झूठा व अन्यायी हो
तो देश का क्या ख्याल रख पायेगा
ऐसे ही लोगो की वजह से
जनता की दिल से नेताओं व अधिकारीयों से
विश्वास मिटने लगा है
जिसको देखो एक कुर्सी के लिए
अपने मे ही तलवार ताने खड़े है
ऐसे मे क्या ख़ुश व सुरक्षित रहेंगे जनता
ज़ब घर के मालिक ही आपस मे लड़ने लगे
तो बाकी सदस्यों के मन मे
आक्रोश और दिल मे संदेह होने लगता है
की क्या हम सही घर मे है…?
ज़ब बड़े खुद निर्णय नहीं लेपा रहे है
सही और गलत का
ज़ब आपस मे ही लड़ने लगे है
वो हमारे भविष्य की निर्णय कैसे ले पायेंगे
ऐसे हज़ारो मन से उठते है
वैसे ही ज़ब देश की सरकार ही
आपस मे लड़ते है तो
हर देशवासियो के दिल मे
ऐसे बहुत से सवाल उठते है
की किसको अपने भविष्य का डोर सँभालने को दें
क्योकि स्वदेश की रक्षा सिर्फ
राज्य सरकार की भार नहीं होता
हर एक स्वदेशी का धर्म होता है की
अपने मात्र भूमि के सुरक्षा
और अपने देश की गौरव को
कोई भी विदेशी कोई भी दाग़ न लगा पाए
ये हमारे मानने की ऊपर है की
हम कौन है हमारे सामने वाला कौन है
कहते है न “मानो तो शिव नहीं तो पत्थर “
ऐसे ही माने तो हर कोई स्वदेश की राजा है
गर न मानो तो हर कोई प्रजा
गर कोई देश की राजा खुद जैसे
सबको एक नज़र से देखता है
तो उस देश की कोई भी प्रजा खुशी के लिए नहीं तरसता
गर वही राज्य सरकार
जिनके सहयोग और वोट से नेता बनता है
रात बीतता नहीं अपने पैरो के धूल समझने लगता है
खुद को भगवान मानने लगता है तो
उस देश की पतन होने मे ज़रा भी देर नहीं होती
ऐसे लोग आजकल हर देश मे
अपने चहरे पर नकाब लगाए बैठे थे
अब एक एक करके सामने देखने को मिल रहे है
ईश्वर से यही प्रार्थना है हमारी की
ये स्वदेश सदैव सुरक्षा और यूही पवित्र रहे
माँ पृथ्वी से बिनती है की
अपने बच्चो को सद्बुद्धि दें
जिससे अभी से भी हालात सम्भल जाए…….!!
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नैना…. ✍️✍️
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