🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹
जैसे तैसे करके दिन बीत जाता है
बहुत मुश्किल से शाम भी ढल कट जाता है
कहाँ गुम रखे खुद को रात विरह की बेला आयी
रोके नहीं रुकता आँखों से दरिया बह ही जाता है
कभी यादों के गहराई मे खुद को भुला देना
दर्द के भीड़ मे खो कर खुद को रुलाते रहना
कितना तकलीफ देती है ये विरह की बेला
रोके नहीं रुकता आँखों से दरिया बह ही जाता है
कोई इसे पागलपन तो कोई आशिक़ी कहता है
क्या होती है तड़प इश्क़ करे वही समझता है
धड़कनो मे आग कोई जलती है विरह की बेला मे
रोके नहीं रुकता आँखों से दरिया बह ही जाता है
पहले भी तारो से बाते होती थीं अब भी है
बस फर्क इतना है की तब होठों मुस्कान थीं अब नमी है
जाने किसने लिख दिया किस्मत मे ये विरह की बेला
सोचकर रोके नहीं रुकता आँखों से दरिया बह ही जाता है
क्या क्या करें बयां बहुत मुश्किल होता है कुछ कहना
लब खामोश और टूटे दिल से हर दर्द सहते रहना
शायद ही कभी खत्म होंगी ज़िन्दगी से ये विरह की बेला
रोके नहीं रुकता आँखों से दरिया बह ही जाता है
हर दर्द हँस कर सहेंगे पर कभी उससे शिकायत न करेगे
जीभर के कर ले सितम अरमान उसकी जहाँ तक है
ताउम्र गुज़ार देगी नैना यूही घुट घुट कर विरह की आग मे
रोकूंगी नहीं उन्हें देखना है वो किस हद तक मुझे तड़पा पता है…!!
🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹
नैना…… ✍️✍️
Spread the love

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *