मानव के जीवन की मूलभूत आवश्यकताएं मे प्राथमिक स्तर पर रोटी, कपड़ा, और मकान की अति- आवश्यकता होती है। रोटी कपड़ा और मकान व्यक्ति जीवन में कैसे हासिल करता है, जिनके पास अधिक धन दौलत होती है उनको छोड़कर, जो लोग मध्यम श्रेणी और मध्यम श्रेणी से नीचे जीवन यापन करते हैं उनके जीवन की प्राथमिक जरूरत रोटी, कपड़ा और मकान उन्हें काफी संघर्ष करने के बाद प्राप्त होते हैं| जिसमें सबसे ज्यादा जरूरी है| रोटी यदि रोटी नहीं मिलेगी तो व्यक्ति जीवित कैसे रहेगा फिर कपड़ा यदि व्यक्ति पर के पास कपड़े नहीं होंगे तो वह क्या पहने गा
फिर आता है मकान व्यक्ति के पास एक परिवार होता है जिसे रहने के लिए एक मकान की जरूरत पड़ती है मकान बनाना मध्यम श्रेणी और निम्न श्रेणी के व्यक्ति के लिए एक टेढ़ी खीर है| आज के इस महंगाई के युग में एक मध्यम और निम्न श्रेणी के व्यक्ति को मकान बनाने के लिए जगह के हिसाब से एरिया के हिसाब से राशि की कीमत की अदायगी करनी पड़ती है जो कम से कम बीस लाख मे एक साधारण सर्व सुविधा युक्त -एक छोटे परिवार के रहने योग्य मकान की कीमत होती है..
अधिकतम की तो सीमा निर्धारित नहीं है, व्यक्ति की जिंदगी की आयु का औषध 80 से 100 वर्ष का ही है, जिसके लिए उसे इतने संघर्ष करने पड़ते हैं, ना जाने कब उसके जीवन का अंत हो जाए लेकिन यदि उसके पास रहने के लिए मकान है, तो उसके परिवार की 60 से 70 प्रतिशत्,जीवन की मूलभूत आवश्यकता की पूर्ति हो जाती है। बाकी की व्यवस्था वह संघर्ष द्वारा, निरंतर प्रयास द्वारा, करते रहता है।
बचपन से आप एक कहावत सुनते आ रहे होंगे कि रोटी, कपड़ा और मकान हमारे जीवन की मूलभूत आवश्यकताएं हैं। यानि हमारे ज़रूरत की ऐसी चीज़ें जिनके बिना हमारा जीना मुश्किल हो सकता है। ये बात आपके बड़ों ने आपको समझाई होगी और आप ने भी शायद अपने से छोटों को यही बताया हो लेकिन आज कल दुनिया भर में प्रदूषण का जो हाल था, उससे कहीं न कहीं ये कहावत बदलती नज़र आ रही है।
अब हमारे लिए यही बहुत है कि हमें स्वस्थ खाना, स्वच्छ हवा और शुद्ध पानी मिल जाए और खास करके आज कल के लोगो को स्मार्ट फ़ोन और इंटरनेट का सुभिदा मिलजाए,,भले भले 2 वक्क्त का खाना और मकान ना हो, किसान जिस तरह से अपनी फसल में कार्बनिक उत्पादों का इस्तेमाल कर रहे हैं, उसने हमारे साथ – साथ पर्यावरण के लिए भी संकट पैदा कर दिया है।
दुनिया की आबादी लगातार बढ़ती जा रही है और इसी के साथ खाद्य उत्पादों की मांग भी बढ़ रही है। मांग को पूरा करने और जल्दी से जल्दी ज़्यादा उत्पादन के लिए किसान अपने खेतों में हद से ज़्यादा रासायनिक पदार्थों का इस्तेमाल करने लगे हैं। खाद से लेकर कीटनाशक तक सब कुछ रासायनिक। इन रसायनों का हमारे स्वास्थ्य पर जितना असर पड़ता है उतना ही असर इनका जलवायु पर भी पड़ता है। खेती का अगर पर्यावरण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता रहा तो खाद्य सुरक्षा पर भी संकट पैदा हो सकता है।और हमारे समाज के लिए ये सही नही है,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
शुक्रिया है ख़ुदा का जिसने ये मुकाम दिया।
ज़िंदगी में रोटी, कपड़ा और मकां दिया ,,
जब नन्हें बच्चों को खेतों में देखती हूं,,
उनके सपनों के चिथड़े मैं देखती हूं ,
नन्हें हाथों से अपने वो हर कार्य करते है ,
बचपन में ही खुशियां अपनी कुर्बान करते हैं
गुज़ारिश है खुदा से कि इतना मुकाम दे,
जरूरतमंदों को रोटी,कपड़े और मकां दे।।
,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,स्वरचित
प्रितम वर्मा✍️✍️🌻🌹🌾
