रोहित शुक्ला लगभग २ घंटे से शिकागो के खूबसूरत लेक शोर पार्क की एक बेंच पर अकेला बैठ हुआ पार्क के सामने की झील के शांत पानी को बड़े ध्यान से देख रहा था, झील के पानी के ऊपर होकर बहती हुई सर्द हवायें उसे बहुत ठंडक दे रहीं थीं।
ये रोहित की हर रविवार की दिनचर्या का ही हिस्सा है, वह इसी बेंच पर घंटों बैठा न जाने क्या-क्या सोचता रहता है।
रोहित एक २६-२७ वर्षीय भारतीय नवयुवक है जो शिकागो की एक बहुत बड़ी आईटी कंपनी फोर्टे ग्रुप में सॉफ्टवेयर इंजीनियर के पद पर लगभग २ साल से काम कर रहा है, कंपनी ने उसको बहुत अच्छा सैलेरी पैकेज और रहने को एक आलीशान फ्लैट दे रखा है, लेकिन काम इतना ज्यादा रहता है कि ऑफिस के बाद उसको अपने घर में भी सुकून नहीं रहता है, दिन रात बस काम-काम।
कभी-कभी उसे लंच के समय भी मीटिंग रखनी पड़ जाती है, काम का टारगेट ऐसा रहता है कि आप काम के अलावा कुछ और सोच भी नहीं सकते हो और आज के काम को कल के लिए टाल भी नहीं सकते हो, आपको हर हाल में अपना काम आज के दिन में खत्म ही करना होगा।
कुल मिलाके उसे केवल रविवार का दिन ही मिलता है जिसमें वह अपने बारे में, अपने पुराने दिनों के बारे में घण्टों बैठ के सोचता रहता, रोहित मूल रूप से लखनऊ का रहने वाला है, उसने आईआईटी कानपुर से एमटेक किया है, उसके पिता रमेशबाबू शुक्ला एक लखनऊ शहर के एक प्रतिष्ठित वकील है और उसकी आशा एक मां ग्रहणी हैं।
घर में पैसे की कोई कमी नहीं है, उसका छोटा भाई राहुल भी आईआईटी कानपुर से ही बीटेक कर रहा है, उसकी छोटी बहन ऋचा अभी १२ वीं कक्षा में पढ़ाई कर रही है।
पापा के बहुत समझाने के बाद भी उसने बेंगलुरु में मिल रही है जॉब को ठुकरा के शिकागो की इस कंपनी के ऑफर को स्वीकार कर वो २ साल पहले भारत छोड़कर शिकागो में आकर रहने लगा।
बचपन से ही रोहित को हॉलीवुड फिल्में देखने और विदेश में घूमने का बहुत शौक था, विदेशों का रहन सहन, वहाँ की खूबसूरती, वहाँ के लोगों की उन्मुक्त जीवन शैली उसे किशोरावस्था से ही आकर्षित करने लगी थी।
बीटेक करने के टाइम से ही उसने विदेश जाकर नौकरी करने का सोच रखा था, उसको लगता था कि विदेशों की जीवन शैली भारत के मुकाबले बहुत बेहतर है और वहां पर पैसा, तरक्की और आगे बढ़ने के बहुत सारे विकल्प हैं, जबकि भारत में ना तो उसे इतना सैलरी पैकेज मिलता है और ना ही इतनी बेहतर जीवन शैली।
रविवार को वो अपने घरवालों से ढेर सारी बातें करता था वरना हफ्ते के बाकी दिनों में वो बस घरवालों के सामान्य हालचाल ही पूँछ पाता था।
स्कूल, कॉलेज और आईआईटी के दोस्त और उसके रिश्तेदार अब बस सोशल मीडिया तक ही सीमित रह गये थे।
फोटोज शेयर, हल्की सी चैट और लाइक्स के लिए उसे टॉयलेट वगैरह में ही समय मिल पाता था।
अब उसे लगने लगा था कि वह धीरे-धीरे मानव मशीन में परिवर्तित होने लगा है और मशीनें कभी थकती नहीं।
उसे अब ये भी समझ में आने लगा था कि USA में इतनी सफाई और लोग इतने अनुशासित कैसे होते हैं क्यों मशीनें सिर्फ निर्देशों का पालन करतीं हैं और बाकी कुछ नहीं।
वो जब भी अपने दोस्तों को खुलकर जिंदगी जीते हुए, मस्ती करते हुए, परिवार के साथ शेयर की हुई फ़ोटो देखता तो उसे कहीं ना कहीं तकलीफ़ का एहसास होता।
उसके खाते में जैसे-जैसे पैसा बढ़ रहा था वैसे-वैसे उसकी जिंदगी से आनन्द, उत्साह और जीवन्त होने का भाव धीरे-धीरे घट रहा था।
जिस सामाजिक प्रतिष्ठा और दिखावे के लिए वो इतना सारा पैसा कमा रहा था, आज वो खुद ही असामाजिक जैसा होता जा रहा था।
वैसे शिकागो बहुत ही जिंदादिल और रंगीन शहर है, यहां के लोग बहुत ही खुशमिजाज, खाने-पीने के शौकीन और मस्त रहने वाले लोग हैं।
शिकागो के बाज़ार , सड़कें और होटेल्स हमेशा लोगों से भरे रहते हैं।
इसलिए रोहित को भी अकेलापन सिर्फ रविवार को ही महसूस होता जब वो अकेला होकर खुद के लिए सोचता है।
उसके अपने मोबाइल पर जगजीत सिंह जी की ग़ज़ल
*ये दौलत भी ले लो…ये शोहरत भी ले लो…*
*भले छीन तो मुझसे मेरी जवानी…*
*मगर मुझको लौटा दो वो बचपन का सावन…*
*वो कागज की कश्ती ..वो बारिश का पानी…*
लगा के सुनने लगा, रोहित भावुक हो उठा, उसे अपनी मातृभूमि की याद आने लगी।
तभी उसके फ़ोन पर उसकी नई-नई गर्लफ्रैंड बनी डेनिएला की कॉल आ गयी, डेनिएला उसका पास के ही रेस्टोरेंट में इंतज़ार कर रही थी।
रोहित के चेहरे पर एक खुशी छा गयी और वो उन घिसी-पिटी यादों के झमेलों से तुरन्त बाहर आ गया और ये गुनगुनाता हुआ रेस्टोरेंट की तरफ चल दिया,
*वो बुढ़िया जिसे बच्चे कहते थे नानी…*
🙏 🇮🇳 🙏
रचनाकार – अवनेश कुमार गोस्वामी
