होता है ईमान हर इंसान में,लेकिन होती है उसकी मजबूरी कोई,और चल देता है वह दूसरी राह पर।क्योंकि उसको भी होती है जरूरत,अपनी भूख मिटाने के लिए रोटी की,सिर छिपाने के लिए एक मकान की,और अपना तन ढकने के लिए कपड़ों की।लेकिन जब उसको नहीं मिलता आश्रय,उन लोगों से जो सक्षम है,दूसरों को पालने- आश्रय देने में,और जब तड़पाती है उसको यह दुनिया।ऐसे में वह चुन लेता है,ऐसा काम और ऐसी राह को,जिसको सभी गुनाह- पाप कहते हैं।लेकिन उसकी मजबूरी ही उसको,बना देती है चोर, बदमाश और ऐय्याश।जबकि वह जब जन्म लेता है,होता है सबकी तरहां एक इंसान,चाहे बाद में वह बन जाये,दुश्मन वह इंसानियत और वतन का।शिक्षक एवं साहित्यकारगुरुदीन वर्मा ऊर्फ़ जी.आज़ादतहसील एवं जिला- बारां(राजस्थान)Spread the love Post navigation कह रहा है वक़्त, तुम वफादार रहोवह है हिन्दी हमारी