जुदा होने के बाद उनसे
अपने हिस्से का प्यार मैंने
कुछ इस कदर निभाया है…
जब भी आई याद उनकी
एक बड़ा सा पैराग्राफ लिखा उनके लिए
और सेंड करने से पहले ही मिटाया है।
उनके बार-बार पूछने पर भी मैंने,
उन्हें सब झूठ ही बताया है…
कि उनके होने या न होने से
अब मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता
उनके सामने हमेशा मैंने यही जताया है।
अब एक मिनट भी बात नहीं होती उनसे
जिनके साथ कॉल पर मैंने दिन-रात बिताया है…
हारकर अपनी मोहब्बत मैंने, गालिब!
उनके नसीब को जिताया है।
बेरहमी से तोड़ दिया मैंने उन्हें
जिन्होंने मुझे प्यार करना सिखाया है…
खुश तो मैं भी नहीं हूं उनका दिल तोड़कर,
मगर देख ए खुदा! उनकी खुशी की खातिर
मैंने उन्हें अपना एक आंसू भी नहीं दिखाया है।
उन्हें सिर्फ शक हुआ था कि बदल गई हूं मैं
मैंने खुद उनके शक को यकीन में बदलवाया है….
यह कैसा नसीब लिखकर भेजा तूने मुझे ए खुदा!
जिनसे की सच्ची मोहब्बत मैंने उसी के हाथों
अपने दामन पर दाग बेवफाई का लगवाया है।
और क्या सबूत दूं मैं? अपनी बेवफाई का उन्हें
उनसे चैटिंग न होने पर भी
स्टेटस मेरा अॉनलाइन नजर आया है…
चलो अब मान भी लो कि बदल चुकी हूं मैं
मगर ए खुदा! यह तो बता
तूने यह गुनाह मुझसे क्यों करवाया है ?
तूने यह गुनाह मुझसे क्यों करवाया है?
:-रचना राठौर ✍️
