हमारी बेटियाँ तो हमारा अभिमान हैं।
अधरों की मुस्कान हैं औ दिल क का अरमान हैं। 
आँखो की रोशनी औ दिल का उद्गार हैं बेटियाँ। 
जीवन का उच्छ्वास न बनें, न हो लहू-लुहान कभी,
यह हमारा प्राण-प्रण का बने प्रतिमान। 
चंचलता है उनमें नदी सी औ गहराई है सागर सी।
जाने कितने रिश्ते निभा जाती हैं बेटियाँ, 
कभी नाराज हो तो कभी खिलखिलाती बेटियाँ। 
नादानियों और समझदारी में बेमिसाल हैंं बेटियाँ। 
जो कभी निवाले लेतीं थी, आज निवाले खिलाती हैं बेटियाँ। 
कभी मनुहार से तो कभी नाराज़गी से,
चाहते मनवाती हैं बेटियाँ। 
कभी गुड़िया सी झूलती थीं बाहों में, 
आज उनके अंको में सजती हैं बेटियाँ। 
घर-घर की फुलवारी,महकती कलियों सी,
चहचहाती चिड़ियों सी,सबको रखतीं आशावान। 
यूँ ही सिलसिला चलता रहा है औ चलता रहेगा, 
सारे आसमाँ की अप्रतिम उड़ान हैं बेटियाँ।।
       रचयिता –
            सुषमा श्रीवास्तव 
             मौलिक कृति
             सर्वाधिकार सुरक्षित 
              उत्तराखंड।
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