सुर्ख जोड़े में सजकर, स्वाभिमानी घर आई।
सुर्ख ओढ़नी लाज भरी,नयनों में काजल सजा।
नाक नथनी स्वाभिमान की,पवित्रता निशानी।
समर्पण हर रिश्तों में,स्वाभिमानी जीवन की चाह।
नहीं बंधिनी गृहस्थी में,गृहस्वामिनी भरे घर की।
ओजस्वी चेहरा दमके,नयनों में झलके आत्मविश्वास।
संस्कार और मर्यादा से नित्य सींच रही रिश्तों को।
लालिमा होंठो की ,आशा का संचार भरे।
बिन्दिया दमके माथे पर,स्नेही सजना के नाम से।
मांग का सिन्दूर गरवान्वित पहचान सुहाग की।
छोड़ आई बाबुल का अंगना।।
–अनिता शर्मा झाँसी।
—मौलिक रचना
