मनुष्य इस सृष्टि की सर्वोत्कृष्ट संरचना है।इसके अंतस्तल में संचित संवेगों में प्रेम सर्वप्रमुख  स्थान रखता है। वैसे तो प्राणी अपने आसपास के हर व्यक्ति  स्थान व जीव से प्यार करता है पर जिस मिट्टी में उस ने जन्म लिया है पालित पोषित और पल्लवित हुआ है उसके लिए प्यार होना स्वाभाविक ही है। वास्तव में देश प्रेम मानव हृदय का अत्यंत पवित्र भाव है, त्याग की भावना देश प्रेम का आधार है। इससे मनुष्य में आत्म बलिदान की भावना जाग्रत होती है।इसलिए सच्चा देशभक्त छोटे-छोटे स्वार्थों में लिप्त नहीं होता, वह लोकहित और मानव कल्याण के लिए सतत् प्रयत्नशील रहता है। कविवर रामनरेश त्रिपाठी के शब्दों में –
देश प्रेम वह पुण्य क्षेत्र है,
अमर असीम त्याग से विलसित।
आत्मा के विकास से जिसमें,
मनुष्यता होती है विकसित।।
देश प्रेम एक स्वाभाविक भाव है क्योंकि जब पशु पक्षी तक अपने स्थान व स्वामी से ममता रखते हैं तो मनुष्य तो ईश्वरीय संरचना का सर्वाधिक संवेदनशील प्राणी है। मनुष्य का हृदय व उसकी आत्मा अपनी जन्मभूमि में ही सच्चे सुख का अनुभव करती है। जिस भूमि में हमने जन्म लिया है, व जिस देश के भौतिक पदार्थों ने हमारे तन मन का निर्माण किया है,जिसके आदर्शों व उसकी संस्कृति ने हमारे जीवन को नया स्वरूप दिया है, उसके प्रति हमारा अनन्य प्रेम शाश्वत ही है। हमारा तन मन धन हमारे देश का है और यही कारण है कि इन्हें अपने देश हित में निछावर करने की लालसा मनुष्य के अंतः में बहुत गहरे बसी हुई है —
विषुवत रेखा का वासी, जो जीता है नित हांफ-हांफ कर,
रखता है अनुराग अलौकिक, वह भी अपनी मातृभूमि पर,
हिम वासी जो हिम में तम में जी लेता है कांप-कांप कर ,
वह भी अपनी मातृभूमि पर कर देता है प्राण निछावर।।
देश प्रेम के भाव की अनंत महिमा का गान कविगण सदा से करते आए हैं ।आदि कवि वाल्मीकि ने मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम के श्रीमुख से जननी जन्मभूमि को स्वर्ग से भी महान घोषित कराया है।
भारत तो सदैव ही वीरों की जन्मभूमि रहा है। यहां का इतिहास त्याग और बलिदान की कथाओं से ओतप्रोत है। भारत माता के महान सपूतों ने अपने देश की स्वतंत्रता और स्वाभिमान की रक्षा के लिए तथा उसके उत्थान के लिए अपने प्राणों की बाजी लगा दी।अंग्रेजों से जूझने वाले स्वतंत्रता सेनानियों ने जो  आदर्श प्रस्तुत किया है वह अनुपम है। निश्चय ही वे प्रेरणा के स्रोत हैं, जो वर्तमान व भावी पीढ़ियों को युग युगांतर तक अमर बलिदान की प्रेरणा देते रहेंगे।
देश प्रेम का भाव अत्यंत व्यापक है देश प्रेम की अभिव्यक्ति विभिन्न रूपों में होती है। जीवन के किसी भी क्षेत्र में कार्य करने वाला व्यक्ति राष्ट्र प्रेमी और देशभक्त हो सकता है।सैनिक युद्ध भूमि में अपने देश प्रेम का परिचय देते हैं तो राजनीतिक और जननायक अपने राष्ट्र के उत्थान का मार्ग प्रस्तुत करते हैं,समाज सुधारक समाज को नया जीवन देकर,धार्मिक क्षेत्र के लोग सच्चे धर्म की शिक्षा देकर राष्ट्र का कल्याण करते हैं। साहित्यकार अपनी रचनाओं के माध्यम से पाठक-वृन्द में राष्ट्रीय चेतना और जन जागरण का स्वर फूंकने की महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। इसी प्रकार देश का छोटे से छोटा और बड़े से बड़ा व्यक्ति अपनी सच्ची कार्य- निष्ठा के द्वारा देश सेवा में सहभागी हो सकता है।
      देश प्रेम का भाव मानव जीवन के लिए अत्यंत उपयोगी और आवश्यक है।इतिहास साक्षी है कि देश प्रेम की भावना में पतन के साथ देश का पतन अवश्यंभावी है।देश की अभाव में व्यक्ति के अस्तित्व का ही नामो निशां मिट जाएगा तभी तो कहा गया है कि–
अगर देश मर गया कहो फिर जिंदा कौन रहेगा,
जिंदा भी रह गया, उसे तब जिंदा कौन कहेगा।
       देश प्रेम विहीन मनुष्य,मनुष्य नहीं कहा जा सकता वह जीवित होते हुए भी मृत-तुल्य है। जिस मनुष्य के हृदय में देश के लिए सेवा-समर्पण की भावना नहीं है वह निश्चित रूप से अपराधी ही नहीं देशद्रोही है। अंत में– देशप्रेम तो जीवन का रस है, जिस हृदय में यह धारा प्रवाहित नहीं होती वह हृदय पाषाण तुल्य है ।सही ही कहा गया है–
जो भरा नहीं है भावों से,
बहती जिसमें रसधार नहीं।
वह हृदय नहीं है पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं।।
सुषमा श्रीवास्तव, 
मौलिक रचना
उत्तराखंड ।
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