सोने की चिड़िया था जो,
अब चिंताओ से ग्रस्त है,
स्वार्थ की अंधी दौड़ में,
मानवता होती त्रस्त है।
कहीं बीमारी, कहीं लाचारी,
बढ़ती देखो जा रही है,
कहीं भरते अमीरों के घर,
तो कहीं मंहगाई खा रही है।
कहाँ गई वो सोने की चिड़िया,
जिसपर सबको गर्व था कभी,
अब क्यूँ इतना अभाव हुआ है,
हुआ करता नित पर्व था कभी।
पूजा पीहू
