रंग रूप पर ना इतना इतराना,
कि दिखावे पर पड़े बाद पछताना,
रंग, रूप है दो दिन की चांदी,
क्यों सूरज को दीपक दिखाना।
नाज़ करना है गुणों पर करो,
देख दिखावे से सदा ही बचो,
बाहरी दिखावा खोखला होता,
इनसे सदा ही दूरी को बनाना,
क्यों सूरज को दीपक दिखाना।
कोई भी पूरा कभी नही होता,
सीखने का मौका नहीं खोता,
ज्ञानी को अपना मित्र बनाओ,
क्यों मूर्ख से दिल को लगाना,
क्यों सूरज को दीपक दिखाना।
सीखना एक प्रकिया है निरंतर,
फिर क्यों रखो सीखने में अंतर,
नम्र होकर ज्ञान को सदा बढ़ाओ,
जीवन इससे तुम्हारा तर जाना,
क्यों सूरज को दीपक दिखाना।

