पुरानी खटिया पर
बंगले के किसी कोने से,
डूबती सी आंखें झांकती है ।
अपने आसपास ,
कहां गया वो स्नेह,
कहां गया वह प्यार ,
खोजती है आँखे है ।
दो जून की रोटीभी,
नौकरों के हाथों आती है।
अपनापन नहीं ,
तिरस्कार संग लाती है ।
गूँजती है जब कानों में,
हंसी ठठ्ठा की आवाज,
गिरती दो बूंदे दर्द ,
बयां कर जाती है ।
मन पर लगे आघात ।
इस घर का पेड़ था जो कभी,
छाया देता था अपार ।
सूख कर जब ठूँठ हुआ तो,
अपनों ने ही कर दिया दरकिनार।
वैभव के गर्द में ,
मान सम्मान कुम्हला गया।
उम्र के इस पड़ाव में ,
अपनों के बीच ,
अपरिचित सा पाया।
आखिर क्यों ………?
यह बुढ़ापा आया……..।
गरिमा राकेश गौतम
कोटा राजस्थान
