सच तो फिर सच है,
सांच को भला आंच कहां,
छुपा लो सौ पर्दों में,
फिर भी दिख जाएगा यहां।
सच-झूठ के खेल में,
जीत होती सदा ही सच की,
देख लो इतिहास पलटकर,
मिल जाएंगे हर खेल वहां,
सच तो फिर सच है,
सांच को भला आंच कहां।
छल-कपट का चक्रव्यूह रचकर,
छुपाओ सच को कितना भी,
परत-दर-परत खुल जाएगा,
सच से भागकर जाओगे कहां,
सच तो फिर सच है,
सांच को भला आंच कहां।
स्वरचित रचना
रंजना लता
समस्तीपुर, बिहार
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