दिसंबर की वो सर्द रात थी,

कुछ अहसासों की बारात थी,

दिल का आलम भी असहज सा,

ख्यालों की बस सौगात थी।

कुछ यूँ हुआ कुछ लम्हों के बाद,

सितारें आसमां में सैकड़ों थे,

पर एक चाँद के दीद के खातिर,

आँखों से अक्सर होती बरसात थी।

वक्त निकलता गया हम संभलते गए,

बेरुखी आदतों को हम समझते गए,

एक शख्स के खातिर बदला ख़ुद को,

फर्क नहीं उसे क्यूंकि कोई और साथ थी।

दूर तो निकल आये थे पर ख्यालों से,

कुछ सवालों से कुछ जवाबों से,

पर रुके थे उसी मोड़ पर आज भी,

जहाँ से थाम कर चली उसका हाथ थी।

ये वक्त की मार थी या ख्यालातों की,

समझ तो हम पाए नहीं थे कभी भी,

पर दिल ने बस यही समझाया मुझे,

कुछ नहीं बस ये दर्द से मुलाकात थी।

●नेहा यादव

स्वरचित रचना

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