‘ अरी सुनती हो !  मेरा तौलिया  नहीं मिल रहा है । आजकल कोई चीज  जगह पर रहती ही नहीं  है । कहाॅं रख देती  हो ?’  कहते हुए सत्येंद्र शर्मा जी ने अपने पूरे कमरे को अस्त – व्यस्त कर दिया । 

‘ यें  क्या कमरे की हालत बना दी आपने ? एक तौलिया को खोजने में पूरे  कमरे को तहस – नहस करके रख दिया । मुझ अकेले से पूरे घर को संभालना मुश्किल हो रहा है । घर को संभालने वाली …  घर की  गृहलक्ष्मी को तो आपने घर से नि……… रेनू  देवी अपनी बातों को खत्म कर पाती इससे पहले ही सत्येंद्र शर्मा जी ने  गुस्से में लगभग चीखते हुए कहा :- ” नाम मत लो उसका ।  वह हमारे घर की  गृहलक्ष्मी नहीं थी । वह तों हमारे घर को तोड़  रही थी …..  मेरे बेटे को भड़का रही  थी …  वह तो  हमारे दिए हुए संस्कार थे जिसकी वजह से हमारे बेटे ने अपनी पत्नी की बात नहीं सुनी । 
‘ हमारे बेटे ने और आपने अपनी बहू की बात नहीं सुनी और तो और आप लोगों ने सुनी  भी तो किसकी ?  एक काम वाली की ।  क्या बहू  से  बढ़कर वह  कामवाली आपके लिए मायने रखती  थी ? ना तो आपने उसकी बात  सुनी और ना ही हम में से किसी को भी सुनने ही दी । एक जज भी  फैसले सुनाने से पहले  वह आरोप लगाने वाले और आरोपी दोनों की सुनता है । दोनों पक्षों की दलीलें सुनने और निष्पक्ष  जांच – पड़ताल करके ही वह दोषी को सजा देता है या उसे बरी  करता है लेकिन आपने तो सिर्फ एक पक्ष की ही बातें सुनी और दूसरे पक्ष को बोलने तक का मौका नहीं दिया । सीधा फैसला ही  सुना दिया । यह भी नहीं सोचा कि वह  कोई गैर नहीं बल्कि आपके बेटे की पत्नी है और आपके पोते की माॅं  है  ऐसा आपने सिर्फ इसलिए किया कि आप इस घर के मुखिया हैं और आप यह  नहीं चाहते थे कि आपके द्वारा कही गई बात कोई काटकर अपने मन की करें । आपने  अपने मन की तो  कर ली लेकिन इसकी सजा मेरे बेटे को मिल रही है पिछले २  साल से वह अपनी पत्नी और बेटे के प्यार से महरुम है । जब भी अपने बेटे को देखती हूॅं  अपने आपको कभी भी माफ नहीं कर पाती  हूॅं । अगर उस दिन मैंने हिम्मत करके आप के खिलाफ आवाज उठाई होती  तो आज मेरा बेटा  यूं हम सबसे छुप – छुप के रोता  मुझे नहीं  मिलता ।’    कहते हुए रेनू देवी पलंग पर बैठ गई और सिसकारियां भरते हुए  रोने लगी । 
‘ तुम औरतों का  बात –  बात पर रोना  यही  मुझे अच्छा नहीं लगता है । कहाॅं  की बात को कहाॅं  लेकर चली गई ? मैं तौलिया मांग रहा था और तुम्हारा प्रवचन शुरू हो गया । मैं खुद ही दूसरे कमरे में जाकर तौलिया ढूंढ लेता हूॅं । मैं इतना सक्षम हूॅं  कि अपने काम  मैं खुद से कर सकूं । मुझे किसी की जरूरत नहीं है  । ना तो  तुम्हारी गृहलक्ष्मी की  और ना ही तुम्हारी ।’  कहते हुए सत्येंद्र शर्मा अपने  कमरे से निकलकर दूसरे कमरे की तरफ बढ़ चले । 
‘ इस कमरे में देख लेता हूॅं ।’  कहते हुए सत्येंद्र शर्मा अपने बेडरूम के बगल वाले कमरे में जैसे ही  घुसते हैं देखते हैं कि  उनकी पत्नी पलंग पर  बैठी किसी से बात कर रही है । 
‘ अरे … अभी तो कुछ देर पहले यह उस कमरे में थी और उसने  गुलाबी साड़ी पहन रखी थी ।  इतनी जल्दी साड़ी भी बदल ली इसने ? नहीं …. नहीं … यह रेणु  नहीं है । थोड़ा और नजदीक जा कर देखता हूॅं  यह औरत कौन है और किससे बातें कर रही है और तो और  यें लोग मेरे घर में आए तो आए कैसे ?’    मन ही मन सोचते हुए सत्येंद्र शर्मा दबे पांव आगे की तरफ  बढ़ते हैं । 
‘ रेनू  …. अब मैं ज्यादा दिनों का मेहमान नहीं हूॅं  । सूरज से कहो कि  इस घर  की गृहलक्ष्मी को पूरे  मान – सम्मान के साथ लेकर आए । मरने से पहले मैं अपनी बहू से माफी मांगना चाहता हूॅं । मेरी एक गलतफहमी की वजह से मेरे बेटे और बहू की गृहस्थी  तबाह हो गई । मेरी ऑंखों पर पड़ा  पर्दा  अब हट  चुका है । उस समय परिस्थितियां कुछ ऐसी थी  कि मैं सही और गलत समझ ही नहीं पाया । अगर मैं अपनी बहू  से माफी नहीं मांग पाया तो मेरी आत्मा अशांत  रहेगी ।’  पलंग पर सोए आदमी की बातें सुनकर सत्येंद्र शर्मा सकते  में आ गए । वें मन ही मन सोचने लगे कि पलंग पर लेटा आदमी तो मेरी पत्नी रेनू का नाम ले रहा है  और यह औरत जो उसके सिरहाने में बैठी हुई है वह रेनू की तरह  ही दिख रही है लेकिन ….. रेनू अभी तो इतनी बूढी़ हुई  नहीं । अभी-अभी तो दूसरे कमरे में मैं रेनू को देखकर आ रहा हूॅं ।  उसके चेहरे पर झुर्रियां है  लेकिन इस औरत के  चेहरे पर झुर्रियां  ही झुर्रियां  है और इस  पलंग पर लेटे  आदमी की आवाज को मैं  पहचानता हूॅं  । यह आवाज   मेरी ही आवाज है लेकिन यह मैं नहीं क्योंकि मैं अभी इतना बूढ़ा  तो हुआ नहीं और ना ही मैं बीमार ही  हूॅं  कि मेरी जिंदगी का अंत समय निकट हो । मेरी और रेनू की तरह दिखने वाले लोग आखिर हैं कौन और मेरे घर में इस समय  क्या कर रहे हैं ? 
सत्येंद्र शर्मा ने पलंग से कुछ दूरी पर खड़े होकर ही अपनी नजरें कमरे में दौड़ाई । कमरा  भी वही हैं …  हाॅं  पेंट थोड़ा पुराना हो गया है लेकिन पेंट भी मेरी पसंद का ही है । इससे यह सिद्ध होता है कि मैं अपने घर के कमरे  में ही हूॅं । अरे !   कैलेंडर में साल कैसे बदल गया ? अभी कुछ  दिन पहले ही तो मैंने कैलेंडर का महीना बदला था और बदलकर नवंबर  किया था  नवंबर २०२१ । अभी इस कैलेंडर में अगस्त २०४१ कैसे दिखा रहा है ? मेरा चश्मा  तो नहीं खराब हो गया ।’ कहते हुए सत्येंद्र शर्मा ने अपनी ऑंखों को छूने के लिए जैसे ही अपना दाहिना हाथ अपनी ऑंखों की तरफ बढ़ाया । ऑंखों और हाथों के बीच में चश्मा आ गया ।  
‘ मैंने चश्मा तो पहना है लेकिन  मैं यह क्या देख रहा हूॅं ?  क्या मैं २० साल आगे आ गया ? मेरी ऑंखें भविष्य में होने वाली घटनाओं को देख रही है इसका मतलब है मैं समय यात्रा करके भविष्य में आ गया हूॅं ।  इस पलंग पर जो  शख्स लेटा मुझे दिख रहा  है वह मैं हूॅं और मेरे सिरहाने रेनू बैठी हुई है पर मैंने ऐसा क्यों कहा कि मुझे बहू  से माफी मांगनी  है ?  रेनू भी  मेरी बातें सुनकर लगातार रोएं  ही जा रही है । मैंने बहू  के साथ जो किया क्या मुझे नहीं करना चाहिए था ? अभी कुछ देर पहले रेनू मुझसे कह रही थी कि मैंने बहू की बात सुनी ही नहीं । मैंने बहू से पूछा था कि तुम्हें अपनी सफाई में कुछ कहना है तो कह सकती हो लेकिन उसने मुझसे सिर्फ इतना ही कहा कि  पापा !  अगर आपको मुझ पर विश्वास नहीं है तो मेरे कुछ कहने ना कहने से आपके  फैसले में कोई बदलाव नहीं आएगा । उसे मालूम हो गया था कि मुझे सच्चाई पता चल चुकी है इसीलिए तो उसने मेरे  फैसले का विरोध नहीं किया और चुपचाप मेरे घर से निकल गई लेकिन भविष्य में हम दोनों बहू के  बारे में क्या बातें कर रहे हैं ? समझ में नहीं आ रहा है कि यहां क्या हो रहा है ? सूरज कहाॅं  है वह नहीं दिख रहा  ? शायद अपने कमरे में होगा उसे देख कर आता हूॅं  कि वह भविष्य में इस समय क्या कर रहा है ? ‘  मन में विचार करते हुए सत्येंद्र  शर्मा उस कमरे से निकलकर अपने बेटे के कमरे की तरफ  जाने  लगते हैं तभी उन्हें किचन से आवाजें  सुनाई पड़ती है । 
‘ बेटे  के कमरे में जाने से पहले किचन में देख लेता हूॅं  कि कौन है और  किसके बीच में बातें हो रही हैं ।’  डाइनिंग हॉल से गुजर कर किचन के दरवाजे पर कदम रखते ही  अचानक से सत्येंद्र शर्मा के  पैर ठिठक कर रुक गए । 
‘ आप हो तो इस घर की बहू लेकिन मालिक आपको किसी नौकरानी से कम नहीं समझते । उन्हें अपने पैसों का बहुत घमंड है । पैसे के घमंड के आगे  ना तो वें मालकिन की ही सुनते हैं और ना ही आपलोगों की ही । देखो ना आज भी आपको इतना सारा सुना दिया  था । मैं आपकी जगह पर  होती तो जवाब दे देती आप ही हो जो चुप रहती  हो । क्या गलती थी आपकी ?  रोहन बाबा अगर उनका  पोता है तो  बच्चा तो आपका ही  है ना । आपने तो रोहन बाबा  को गालियां नहीं सिखाई वह तो मेरी बेटी एक  दिन आई थी और उसके मुंह से छोटे बच्चे ने सुन लिया और उसे रटने लगा । आप कहोगी भी तो मालिक आपकी बात नहीं समझेंगे । आपको ही कहेंगे कि आप अपने बेटे को अच्छे संस्कार नहीं दे रही  हो । आप कुछ तो  बोलो ? कुछ बोलती ….. कामवाली बाई आगे कुछ बोलती उससे पहले  किचन में खाना बना रही  औरत जो सत्येंद्र शर्मा की बहू थी ने अपने हाथ के इशारे  से चुप कराते हुए कहा कि ” छोड़िए ना   इन सब बातों को हर घर में इस तरह की  बातें होती ही रहती हैं  और अच्छा किया पापा ने कि मुझे डांट लगा दी । आजकल मैं मुन्ना पर ज्यादा ध्यान ही नहीं दे पा रही  हूॅं ।  मुझे अब उस पर ध्यान देना पड़ेगा नहीं तो वह आज एक गाली उसने बोली है आगे और भी ना जाने क्या-क्या बोलेगा ?  समय से उसे मुझे  रोकना ही होगा । कहीं ऐसा ना हो कि घर का  इकलौता चिराग  होने की वजह से बदमाश हो जाए । 
अब जल्दी-जल्दी साग काट कर दीजिए आज पापा ने कहा है कि साग ही  बनाना है । मैं जल्दी से पापा के गर्मागर्म  रोटियां सेंक  देती हूॅं और सांग  बना देती हूॅं  । आप तो जानते ही हैं कि पापा को देरी बिल्कुल भी पसंद नहीं है । मैं फटाफट सारे काम निपटा लेती हूॅं और मुझे ऑफिस जाने में भी तो देरी हो रही है ।  मैं जल्दी से साग और रोटियां सेंक  कर मुन्ना  को तैयार कर उसे स्कूल छोड़ते हुए ऑफिस निकल जाऊंगी ।” 
‘ बहू रानी एक  काम करो ! मैं साग और रोटियां सेंक  दूंगी । आप जाकर मुन्ना  को तैयार करो और खुद भी तैयार हो जाओ बाकी काम मैं संभाल लूंगी ।’  कामवाली बाई  ने कहा । 
‘ सच ! आप कर लेंगी तो ठीक है मैं जाकर मुन्ने  को तैयार करती हूॅं और खुद भी तैयार हो जाती हूॅं । आप कितनी अच्छी है । मेरी अनकही बातें भी आप  समझ जाती हैं।’  सत्येंद्र शर्मा की बहू ने अपनी  काम वाली  की तरफ मुस्कुरा कर देखते हुए कहा । 
सत्येंद्र शर्मा की बहू किचन से निकले उससे पहले ही सत्येंद्र शर्मा एक तरफ उससे छुपकर खड़े हो जाते हैं ।  उनकी बहू किचन  से निकलकर अपने कमरे में चली जाती है और  सत्येंद्र शर्मा वापस से किचन के दरवाजे पर खड़े हो जाते हैं । 
‘ अब  मालिक से कहूंगी कि आपकी बहू  आपके बारे में क्या क्या – क्या  कहती है । जो – जो बातें मैंने उनकी बहू से मालवीय के बारे में  कही है वही बातें मैं कहूंगी कि आपकी बहू आपके  बारे में बोल रही थी । 
१५  साल से ऊपर से इस घर में काम कर रही हूॅं । मालिक भी मेरी बातों का विश्वास करेंगे वैसे भी मालिक को बहुरानी का ऑफिस जाना पसंद नहीं है ।  वह तो सिर्फ अपने बेटे के कारण इसको झेल रहे  है । 
आज मालिक को चावल दाल और सब्जी ही खाने को  दूंगी । वें जब रोटी और साग के बारे में पुछेंगे  तब कह दूंगी कि बहुरानी ने कहा है कि जो बना है वही खाना पड़ेगा । मैं रोज-रोज के नखरे नहीं सहुंगी ।  मैं भी काम करती  हूॅं ।  मेरे पास समय नहीं है कि उनकी फरमाइशें  पूरी करती रहूं । इस बहुरानी  ने मुझे  मालिक के कमीज़  से पैसे चुराते हुए देख लिया था । उसने  मुझसे कहा था कि मैं आपको सिर्फ एक बार समझाऊंगी  अगर आप नहीं समझी  तो मैं पापा को जाकर आपकी सारी असलियत बता दूंगी  और  पापा आपको घर से निकाल देंगे । अब  देखना बहुरानी कौन घर से निकलता है ?’  कामवाली ने  इतनी जोर से कहा था कि सत्येंद्र शर्मा के कानों ने  उसके कहे शब्दों को सुन लिया था । 
‘ यह तो मैं २०१९  में आ गया । इसी काम वाली बाई की बातों में आकर मैंने अपनी बहू को घर से निकाल दिया था ।   हे ! ईश्वर मैंने यह क्या कर दिया ? अभी कुछ देर पहले जब मैं भविष्य में गया था मैं अपनी इसी गलती की माफी अपनी बहू  से मांगना चाहता था । उस कमरे में उनकी बातें तो समझ नहीं पाया था लेकिन इस किचन के दरवाजे पर खड़े होकर मैंने सारी बातें अपनी ऑंखों से देख भी ली है और सुन भी ली है । सही कह रही थी रेनू ! मुझे एकतरफा  अपना निर्णय नहीं सुनाना चाहिए था । मुझे अपने बच्चों की जिंदगी खराब नहीं करनी चाहिए थी । मैंने भी अपनी बेटे  के  दुख को  देखा है ।  वह भी तो अपने बेटे और पत्नी से दूर है । मैं पहले यें  सब बातें क्यों नहीं सोच पाया ? क्या मेरे पिता मेरी पत्नी के साथ मैंने जैसा  व्यवहार अपनी बहू के साथ किया है ऐसा व्यवहार अगर वें  करते तब भी  मैं कुछ नहीं बोलता ? हे  ईश्वर आपका लाख-लाख धन्यवाद है कि आपने समय यात्रा को माध्यम बनाकर मेरी ऑंखें खोल दी । अगर आगे भी  आपकी कृपा रही  तो मैं सारी बिगड़ी  बातें सही कर दूंगा और इस घर में पहले की तरह ही  खुशियां ही खुशियां होंगी । मुझे अतीत के समय यात्रा से निकलकर वर्तमान में जाना होगा जहां रेनू मेरा इंतजार कर रही होगी । 
सत्येंद्र शर्मा किचन की  तरफ से आगे बढ़ते हुए अपने कमरे  की तरफ जाने वाले रास्ते की तरफ  मुड़ जाते हैं । वें  जैसे ही कमरे में पहुॅंचते हैं उन्हें अपनी  पत्नी रेनू  की आवाज सुनाई देती है ।  वह  उनसे कह रही होती है कि कहाॅं  चले गए थे ?  तौलिया तो यही पड़ा था और ना जाने कहां – कहां पर चक्कर लगाकर आ गए । पहले तो दिमाग ही खराब था अब तो ऑंखें भी खराब हो गई है आपकी । सत्येंद्र शर्मा अपनी पत्नी की बातें सुनकर आज गुस्सा नहीं हो रहे हैं ।  वें तो  मंद – मंद मुस्कुरा रहे हैं जिसे देखकर उनकी पत्नी रेनू आश्चर्य  में है । 
########## समाप्त #############
                                                  धन्यवाद 🙏🏻🙏🏻
” गुॅंजन कमल ” 💓💞💗
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