
संयम’ तो सीधे उसी ओर रुख करते हैं। संयम, सेवा और सहिष्णुता ये ऐसे सद्गुण हैं जो जीवन को सरलता की ओर ले जाने में सहायक होते हैं साथ ही स्वयं को सन्तुष्टि प्रदान करते हैं अर्थात आत्मतुष्टि रूपी गुण से सुसज्जित कर व्यक्तित्व में चार चाँद लगा देते हैं। क्यों सही कहा न हमने? फिर संयम तो सभी गुणों का सरगना बन सबकी साज संभाल करता रहता है।जो संयमित है, वह आजीवन खुशहाल होने की संपदा पा लेता है। दुःख तो उसे दूर से ही प्रणाम कर लेता है।ऐसा व्यक्तित्व स्वयं को ही नहीं अपने सम्पर्क में आने वाले को भी सुख-संतोष रूपी उपहार बांटने में समर्थ हो समाज का हितैषी कहलाने का अधिकारी स्वभाविक रूप से बन जाता है क्योंकि समाजिकता और परोपकार उसके आचरण में कूट-कूट कर भरा होता है।सादगी की सज्जा उसे सदैव शोभित करती है। संयम वह आवरण है जो जिस किसी पर भी चढ़ गया वह समर्थ हो गया, सफलता के श्रेय का अधिकारी हो गया। सबसे बड़ी बात कि उसके अंतः में हर दशा में समभाव का उदय उसको सर्वथा सर्वत्र प्रतिष्ठित करता है। कैसा भी अभाव तो लेशमात्र भी उसे स्पर्श नहीं कर सकता है।
धन्यवाद!
राम राम जय श्रीराम!
लेखिका- सुषमा श्रीवास्तव, मौलिक विचार, रुद्रपुर, उत्तराखंड।
