संगीत के सात सुरों में,
जीवन की सभी कहानी है,
वक्त के ताल पर थिरकता,
कल-कल बहता पानी है।
सा से सागर से भी गहरा,
रे से रेत की तरह तपता,
ग से गीत की तरह गाता,
म से मौसम की तरह बदलता,
कभी हंसी तो कभी यह,
आंखों से बहता पानी है,
वक्त की ताल पर थिरकता,
कल-कल बहता पानी है।
प से पूनम का चांद यह,
ध से धरती से भी भारी,
नी से नीरसता में रस ढूंढता,
उम्र गुजरे सबकी यूं ही सारी,
बहते-बहते जो रुक जाए,
फिर नहीं लौटकर आनी है,
वक्त के ताल पर थिरकता,
कल-कल बहता पानी है।
स्वरचित रचना
रंजना लता
समस्तीपुर, बिहार
