“गोसाउन गृह प्रवेश”

“नाहर राजा अपने पुत्र और पुत्रवधू के स्वागत के लिए भव्य समारोह आयोजित करते हैं।पूरे राज्य को सुगंधित पुष्प से सुसज्जित करवाते हैं। एक सौ आठ आरती की थाल सजाकर, नाहर राजा सहित, एक सौ आठ मातायें और सारे नगर वासी स्वागत के लिए राज्य के मुख्य द्वार पर, व्यग्रता पूर्वक प्रतीक्षा कर रहे थे।बैरसी सहित, नाहर राजा के एक सौ आठ पुत्र- पुत्रवधू जब राज्य के मुख्य द्वार पर पहुंचे।वहां की शोभा देखने योग्य थी।सब पुत्र घोड़े पर सवार और पुत्रवधू सोने की पालकी पर थीं। पालकियों को हीरे-मोती की लड़ियों से सजाया गया था।सब की नजर पालकियों पर ठहर सी गई।सब मंत्र मुग्ध हो पालकियों को निहार रहे थे।तभी नाहर राजा की बड़ी रानी तांती, आरती की थाल लेकर गोसाउन के सामने आती हैं। वह बड़े प्यार और सम्मान से पालकी से बाहर निकाल अपलक निहारने लगती है।गोसाउन लाल लंहगे में, हीरे मोतियों के आभूषणों से सुसज्जित, स्वर्ग की अप्सरा सी प्रतीत होती है।चेहरे पर एक अलग सी आभा, मुखारविंद पर तेजऔर आंखों में नमी, पलकें झुकी हुईं।साक्षात देवी प्रतित हो रही थी।साथ ही गोसाउन की बहन सुकन्या, जो अपनी बड़ी बहन की परछाई लग रही थी।नाहर राजा ने कहा! राजमहल में निहारती रहिएगा, अपनी बहूओं को। अभी आरती करें।नाहर राजा द्वारा कहे गए शब्दों से, सब रानियों की तन्द्रा भंग होती है। सभी रानियां अपनी अपनी बहूओं की आरती उतार महल में प्रवेश करवाती हैं।जब मुंह दिखाई की रस्म होती है। तभी लिली, बैरसी के कंधे पर लटक जाती और हंसी-मजाक करने लगती है। जिस कारण बैरसी गोसाउन को नहीं देख पाते हैं।कोवर में जब गोसाउन और बैरसी को छोड़कर बाकी सब आ जाते हैं, तभी, लिली आकर कहती है, गोसाउन से! तुम होगी कहीं की राजकुमारी। कहीं की महारानी। बहन, बेटी, बहू, भाभी। परन्तु अपने पति की पत्नी, तुम सिर्फ नाम की हो।मैं बैरसी को एक पल भी खुद से दूर नहीं जाने दूंगी। तुम्हारे पास तो बिल्कुल नहीं। फिर वह पलंग पर लेट जाती है। बैरसी से लिपट कर, मस्ती करने लगती है।गोसाउन कहती है! तुम को लज्जा नहीं आती? धर्म का अंश तुम्हारे अंदर बिल्कुल नहीं है।परन्तु मैं, धर्म विरुद्ध, कुछ नहीं करूंगी।लीली, तू पतली दुबली तार मसूर जैसे तेरे केस।भाग भाग तू लिली, तेरेअंदर नहीं है धर्म का अंश।पुनः दूसरे दिन गोसाउन, पूरे कमरे में बालू बिखेर देती है। ताकि, लिली बैरसी के पास, ना आ पाए।गोसाउन जैसे ही बैरसी के पास आकर कुछ बोलने की कोशिश करती है।लिली अपने हाथों से कंगन निकाल कर,  बालू पर रख देती है और कंगना के सहारे लिली बैरसी के पास आकर, फिर से लिपट जाती है।गोसाउन कहती है!लिली काली तू कचनार काला भाग्य तोहारकर्म दोष कौन मिटाए जान कोई नहीं पाए।महिनों तक राजमहल में उत्सव मनाया जाता है।फिर मध्यस्थ राजा अपनी पुत्रियों से मिलने के लिए आते हैं।सुकन्या अपने पिता से कहती है!यहां हम बहनों को बहुत ही प्यार सम्मान और इज्ज़त मिलती है। परन्तु गोसाउन को, पति का प्यार नहीं मिलता। सब बातें अपने पिता को बता देती हैं।मध्यस्थ राजा, इतना सुनते ही, क्रोधित हो गए।बैरसी और लिली को, समुद्र में फेंक देने की आज्ञा, अपने सेनापति को देते हैं।जब बैरसी और लिली को फेंक कर, सेनापति राजमहल वापस आकर, मध्यस्थ राजा से बात करते हैं, गोसाउन सुन लेती है।गोसाउन कहती है! मैं, सौतन के पैरों के नीचे रहने के लिए तैयार हूं।सौतन के द्वारा दिए, हर कष्ट को झेलने के लिए तैयार हूं।आप मेरे सुहाग को वापस लेकर आइए।फिर कभी मेरे और मेरे पति के लिए, आप कुछ नहीं करेंगे। नहीं तो मैं, आप से सारे रिश्ते तोड़ लूंगी।मध्यस्थ राजा, अपनी पुत्री के सामने विवश हो गए।मध्यस्थ राजा ने कहा!हमें नहीं पता, बैरसी समुद्र में अबतक जीवित भी होगा या नहीं। तुम को धर्म और भाग्य पर इतना ही विश्वास है तो, अपने स्वामी को तुम ही बचा सकती हो।तुम्हारे अलावा और किसी में यह सामर्थ्य नहीं है।और सूर्य डुबने से पहले बचा पाई तो ठीक है। नहीं तो, देवता भी नहीं बचा पाएंगे।गोसाउन नंगें पांव समुद्र की ओर दौड़ने लगती है।गोसाउन के पीछे पीछे हाथी- घोड़ों सहित, हजारों सैनिकों को साथ लेकर, नाहर राजा निकल पड़ते हैं।उन्हें नहीं पता, गोसाउन इतनी तेजी से कहां जा रही है।परन्तु मन अंजानी आशंकाओं से घिर जाता है।कुछ ही पलों में गोसाउन समुद्र तट पर पहुंच जाती है।वहीं राजा को पहुंचने में घंटों लग गए।समुद्र तट पर पहुंच कर, गोसाउन इस तरह विनती करती है।हे दसों दिशाओं! आप साक्षी हैं। मेरे हर कर्म की।समुद्र में निवास करते तेंतीस कोटि देवी देवताओ, कोटि कोटि प्रणाम स्वीकार कीजिए।हे समुद्र देवता!मैंने मन वचन और कर्म से आपका आराधना की होगी तो , मुझे मेरा सुहाग वापस लौटा दो।अगर मैंने अंजाने में भी किसी का दिल नहीं दुखाया होगा तो, मेरे स्वामी को वापस लौटा दो।अगर धर्म विरुद्ध मैंने कोई कर्म नहीं किया होगा तो, मेरे स्वामी को वापस लौटा दो।इतना कहकर वो जैसे ही, समुद्र में प्रवेश करने लगती है। तभी उसके पांव के नीचे बैरसी का पैर आ जाता है। बैरसी, लिली सहित वापस निकल आता है।नाहर राजा, अपने पुत्र की हालत देखकर विचलित हो जाते हैं।साथ ही गोसाउन के धर्म, विश्वास और ईश्वर में आस्था पति का प्यार ना पाने के वावजूद, स्वामी भक्ति को देखकर, बहुत प्रसन्न होते हैं।मध्यस्थ राजा, अपने राज्य वापस लौट गए। नाहर राजा  गोसाउन को अलग से महल बनवा कर रहने के लिए देते हैं। फिर वह, पूरे राजमहल की जिम्मेदारी, गोसाउन को सौंप देते हैं।रसोई में भोजन बनाना हो। या, राजमहल की सजावट। हर काम में गोसाउन सबसे आगे रहती थी।यहां तक कि, नाहर राजा भी, अपने राज्य के किसी कार्य में बैरसी के साथ, गोसाउन से भी मंत्रणा अवश्य करते।गोसाउन के दिए निर्देश और सलाह से राज्य में बहुत ही तरक्की और खुशहाली छा जाती है।गोसाउन के विचार और व्यवहार से, बैरसी भी बहुत प्रभावित होता है।घर में सासू मां की लाडली, लक्ष्मी स्वरूपा बहू, राज्य के लिए हितकारी साबित होती है।इतना करने के बाद भी, उसे पति का प्यार नहीं मिलता।बैरसी से छोटा भाई, चनाइ का विवाह, गोसाउन की छोटी बहन सुकन्या से होती है।सुकन्या से अपनी बहन की पीड़ा सहन नहीं होती है। वो चनाइ से कहती है!कुछ ऐसा करिए, जिससे मेरी बड़ी बहन के होंठों पर मुस्कान आ जाए।चनाइ कहते हैं! मुझसे भी, भाभी का दुःख, देखा नहीं जाता। कुछ तो करना ही पड़ेगा। क्रमशः ‌   अम्बिका‌ झा 👏

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