“नागिन कहती हैं!आप का मायका है यहां। आराम से रहिए, कोई काम मत करिए।छोटी बहू कहती है, ठीक है। किंतु, शाम होते ही इंसानी स्वभाव वश घर में सांझ दिखाने लगती है। महल के कोने कोने में दिया रखने के उपरांत, नागराज के फन को दियठ समझ वहां भी दिया रख देती है।।नागराज गुस्से में नागिन से कहते हैं। आज़ तो मैं उस इन्सानी कन्या को डस ही लूंगा। वो रोज रोज मेरा मस्तक जला देती है।नागीन कहती हैं। ऐसा मत कीजिए। विवाह उपरांत बेटी अपने मायके में अतिथि होती है। घर आए अतिथि को आप अपने घर में क्षति नहीं पहूंचा सकते हैं।दुसरी बाल-बसंत बहन बनाकर उस कन्या को घर लाए हैं तो, वो आपकी बेटी ही हुई। बेटी के जन्म से ही पिता उसके लालन-पालन शिक्षा एवं अच्छे परिवार में विवाह करने के लिए चिंतित रहते हैं। जिस कारण उनका सर गर्म रहता है।तो सहज रुप से एक पिता के दायित्वों को निभाते हुए आप का मस्तक गर्म होना स्वाभाविक है।फिर अगर आप नहीं मानते हैं इन सभी बातों को तो, जब बेटी विदा होकर ससुराल चली जाएगी, तब वहां जाकर डस लेना।जब तक हमारे यहां है, आप उन्हें कुछ मत कीजिए।अब नागराज प्रतिक्षा करने लगे। कब यह इंसानी कन्या अपने ससुराल जाए और कब वो वहां जाकर उसे डस लें।कुछ समय उपरांत छोटी बहू को उसके पति की चिंता होने लगी।वो तो यहां राजकुमारियों की तरह महल में आराम कर रही है। किन्तु, उसका पति न जाने वहां कैसे रहता होगा।समय-समय से भोजन करता होगा या नहीं।उसके कपड़े कौन साफ करता होगा।वो खेत पर अकेले कार्य कर थक जाते होंगे तो, उनकी सेवा कौन करता होगा।वो सकुशल होंगे या नहीं?नाना प्रकार की चिंताओं से ग्रस्त छोटी बहू ने नागिन से कहा! मां, बहुत समय व्यतीत हो गया है, अब ससुराल भेज दो।नागिन कहती हैं! ठीक है। कल श्रावण पूर्णिमा है। भाई बहन का अनुपम त्यौहार। प्रातः बाल बसंत की कलाई में रक्षा धागा बांध कर उनकी रक्षा के हेतु ईश्वर से प्रार्थना कीजिए। तत्पश्चात वो दोनों ही भाई आपको आपके ससुराल लेकर जाएंगे।नागिन कहती हैं। एक बात मेरी ध्यान रखना।रात्रि सोने से पहले, इस मंत्र को जोर जोर से तीन बार पढ़ना, फिर सोना।चाहे रात्रि कितनी भी ज्यादा हो जाए, चाहे तुम कितना भी अधिक थक जाओ, इस मंत्र को पढ़ना कभी मत भुलना।।

दीप दिपहरा जाथ धरा। मोती-मानिक भरे घड़ा।नाग बढ़े नागिन बढ़े। पांच बहिन बिसहरा बढ़े।।बाल बसंत भैया बढ़े। डाढ़ी-खोंढ़ी मौसी बढ़े।आशावरि पीसी बढ़े। बासुकी राजा नाग बढ़े।।”बासुकिनि माय बढ़े। खोना-मोना मामा बढ़े।राही शब्द ले सोऊ। कांसा शब्द ले उठूं।।होते ही प्रातः सोना कटोरा में दूध-भात खाऊं।सांझ सोऊं प्रात उठूं, पटोर पहिरूं कचोर ओढ़ूं।।ब्रम्हाक दिया कोदाल, विष्णु चांछल बाट।भाग-भाग रे कीड़ा-मकोड़ा इसी राह आएंगे ईश्वर महादेव,पहल गरूड़ का ढ़ाठ। आस्तीक, आस्तीक, गरूड़, गरूड़।।”

छोटी बहू ने कहा ठीक है नागीन ने बेटी की विदाई के लिए हीरा मोती मणी माणिक, मधुर मिठाई, कपड़े, फल और मेवा से बैल गाड़ी सजा कर पालकी मंगवाकर रख लिया।।प्रातः रक्षाबंधन का त्यौहार मना कर बाल बसंत के साथ बेटी को विदा करते वक्त आंखों से आंसू छलक आए।कहती हैं! आप के रहते दिन कैसे बीते, पता ही नहीं चला। अब अकेले मेरा मन कैसे लगेगा?आप का जब मन करे शीघ्र आ जाना।आपकी मां व्याकुलता से राह देखेंगी।छोटी बहू भी अचानक रोने लगी।उसने कहा! हमने पहली बार मायके का सुख भोगा है। हमें तो मालूम भी नहीं था, मायका ऐसा होता है।अब समझ में आया। मेरी जेठानी जब मुझे बताया करती थी।दोनों मां बेटी अश्रु भरे नयनों से एक दूसरे को देखतीं रही। जब तक नज़र से ओझल नहीं हो गई।।क्रमशः

अम्बिका झा ✍️

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