“कार्तिकेय जन्म”

“एक समय देवता आकर महादेव से कहते हैं। आप को स्मरण तो है न। आपका और माता गौरी का पुनः मिलन किस उद्देश्य से हुआ है? तारकासुर का अत्याचार बढ़ता जा रहा है। शीघ्र ही उपाय नहीं मिला तो, सृष्टि का विनाश हो जाएगा। महादेव कहते हैं! आप लोग चिंता न करें। बहुत ही जल्द तारकासुर का अंत होने वाला है।महादेव ग़ौरी के संग संभोग करने के उद्देश्य से निर्जन वन में गए।वहाँ सुगन्धित पुष्प के वृक्ष के नीचे झाड़ी में वो बैठ गए और एक दूसरे को निहारने लगे। वहाँ वो दोनों ही एक-दूसरे में इस तरह खो गए बाकी सब कुछ भूल गए। बहुत समय व्यतीत होने के उपरांत देवताओं को चिंता होने लगी।तत्पश्चात वो लोग ब्रम्हा जी के पास पहुंचे। महादेव और गौरी के विषय में बताने लगे। देवताओं ने कहा अगर तीन लोकों के स्वामी महादेव एवं स्वयं सृष्टि महाकाली की संतान माँ गोरी के गर्भ से उत्पन्न हुआ तो, वो इतना शक्तिशाली होगा कि जन्म के उपरांत ही समस्त सृष्टि का विनाश कर देगा।इसलिए कुछ ऐसा उपाय करना होगा जिससे माँ गौरी के गर्भ के द्वारा उनकी संतान की उत्पत्ति न हो।ऐसा विचार कर देवताओं ने जंगल में जाकर, चिल्लाना शुरू कर दिया। आपस में लड़ना शुरू कर दिया।महादेव तो अंतर्यामी थे वो सब समझ गए। तदोपरांत महादेव का अचानक से ध्यान भंग हो गया और उनका वीर्य धरती पर गिर गया। किन्तु धरती से उनका भार सहन नहीं हुआ। उन्होंने उस अंश को अग्नि में फेंक दिया। उन्होंने उसे पहाड़ पर फेंक दिया। पहाड़ से भी भार सहन नहीं हुआ तो, उसने भी सरपत वन में फेंक दिया। पहाड़ से गिरने के कारण वो अंश छः भागों में बंट गया। जिस वन में गिरा वहां कृतिकाएं रहती थीं। उन छः भागों को जोड़ दिया। जिससे एक छ: मुख वाले बालक का जन्म हुआ। जिन्हें छः कृतिकाओं ने मिलकर पाला। जिस कारण बालक का नाम कार्तिकेय पड़ा।इधर माँ गौरी, महादेव के संग संभोग में विघ्न उत्पन्न करने के कारण देवताओं से नाराज़ होकर क्रोधित होकर श्राप देती है। जिस प्रकार मैं अपने गर्भ से संतान को जन्म नहीं दे पाईं।,उसी प्रकार अन्य देवताओं की संतान भी गर्भ से उत्पन्न नहीं होगी।।छः कृतिकाएं कार्तिक को सभी प्रकार के अस्त्र शस्त्र एवं कलाओं से परिपूर्ण कर एक योद्धा तैयार करने लगीं।इन गतिविधियों से अंजान तारकासुर, अपने ही अहम् में चूर, देवताओं और ऋषियों की तपस्या में विघ्न उत्पन्न करता रहा। समस्त संसार का विनाश करने के उद्देश्य से वो, निरपराधों को मारता रहा।उसे इस बात का विश्वाश हो गया कि अब इन्द्र के सिंहासन पर उसका ही एकक्षत्र राज्य स्थापित होगा।तभी देवताओं ने कार्तिकेय से मिलकर युद्ध की नीति बनाई।देवताओं ने कार्तिक को देवताओं का सेनापति बनाया।देवताओं ने तारकासुर को युद्ध के लिए ललकारा।आकस्मिक हुए हमले से तारकासुर को संभलने का मौका भी नहीं मिला।वर्षों तक स्वामी कार्तिकेय और तारकासुर का युद्ध होने के उपरांत, तारकासुर का अंत कार्तिकेय के हाथों हुआ।देवताओं ने स्वामी कार्तिकेय को आशीर्वाद देते हुए, समस्त संसार का सर्वश्रेष्ठ योद्धा घोषित किया। देवताओं के सेनापति के तौर पर उनका स्वागत किया।।”क्रमशः अम्बिका झा ✍️

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