हमारे जीवन की डगर शिक्षा के महत्त्वपूर्ण पायदान से होकर गुजरती है। शिक्षा हर किसी के लिए अति आवश्यक है ।चाहे वह गरीब हो या अमीर या फिर किसी भी लिंग, जाति, धर्म, समुदाय या स्थान से संबंध रखता हो।
शिक्षा का प्रयोजन है व्यक्ति का सम्पूर्ण और समग्र विकास, उसके शरीर, मन, बुद्धि तथा आत्मा को सबल-सशक्त बनाना, उसमें अच्छे-बुरे, उचीत-अनुचित, पाप-पुण्य, हित-अहित का विवेक पैदा करना। शिक्षा मनुष्य को सभ्य, सुसंस्कृत, शालीन, सच्चरित्र बनाती है, उसे जीवन जीने की कला सिखाती है। शिक्षा प्राप्त करनेवाला अपना ही नहीं सम्पूर्ण मानवता का हित-साधन करता है।
      व्यवसाय का अर्थ है जीवित रहने के लिए, जीविकोपार्जन के लिए कोई काम-धन्धा करना जिससे प्राप्त आय से व्यक्ति अपना, अपने परिवार-जनों का लालन-पालन कर सके, जीवन की अन्य आवश्यकता पूरी कर सुख-चैन से जीवन बिता सके। वह व्यवसाय करता है केवल अपने हित के लिए संसार के हित से उसे कोई लेना-देना नहीं है। व्यवसायी व्यक्ति केवल उतना पढ़ता-लिखता है जिससे वह हिसाब-किताब कर सके, बही-खाता लिख सके, आवश्यकता पड़ने पर अन्य व्यापारी को पत्र लिख सके।
 शिक्षा और व्यवसाय का कोई सीधा सम्बन्ध नहीं है।
आज स्थिति बदल गयी है। आज शिक्षा पाने का मुख्य लक्ष्य जीविकोपार्जन हो गया है। विद्यार्थी विश्वविद्यालय की डिग्री इसलिए प्राप्त करता है ताकि उसके बल पर उसे रोजगार, या नौकरी मिल सके। इसीलिए आज कल शिक्षा को व्यवसायोन्मुख  बनाया जा रहा है। 
आज व्यावसायिकता एक प्रदेश, एक देश या एक महाद्वीप में सिमट कर नहीं रह गयी है। वह राष्ट्रीय और इससे भी बढकर अन्तर्राष्ट्रीय स्तर की हो गई है। अतः यदि कोई व्यवसायी अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर सफल होना चाहता है तो उसे अनेक प्रतिद्वन्दियों से स्पर्धा करनी पड़ती है और स्पर्धा में वही जीत सकता है, आगे बढ़ सकता है जिसे अन्तर्राष्ट्रीय व्यावसायिक गतिविधियों की जानकारी हो, अन्तर्राष्ट्रीय जटिल नियमों और कानूनों का ज्ञान हो। 
आज व्यवसायी और व्यवसाय दोनों की सफलता और समृद्धि के लिए शिक्षा आवश्यक है। शिक्षा उनके लिए समय की माँग है जिसको अनदेखी नहीं कर सकते, अनेदखी करने का परिणाम होगा असफलता।
सारांश यह कि व्यवसाय पाने अर्थात् नौकरी, रोजगार, आजीविका पाने के लिए भी शिक्षा अनिवार्य है और व्यवसाय करने, उसका सफल संचालन के लिए भी शिक्षा आवश्यक है। समय परिवर्तनशील है, युग बदलता है, युग के साथ-साथ परिस्थितियाँ बदलती हैं। चतुर व विवेकावान वही है जो समय की आवश्यकता को पहचान कर कार्य करे। 
‘बहै जब जैसी बयार, पीठ तब तैसी दीजै’ 
आज व्यवसाय के तौर-तरीके बदल गये हैं, अब वह देशों की सीमाओं को पार कर अन्तर्राष्ट्रीय बन गया है। अतः शिक्षा का अर्थ और प्रयोजन भी बन गया है। आज शिक्षा व्यवसायोन्मुख हो गयी है।
 पुरातन काल में ज्ञान दान किया जाता था और इससे उत्तम पुण्यकर्म कोई दूसरा नहीं माना जाता था। शिक्षण से जुड़ा इंसान समाज में पूज्य होता था पर अब वह न समय रहा और न ही वैसी विचार धारा के लोग। जब अन्य व्यवसाय से जुड़े लोग धनाढ्यता (अमीरी) की ओर अग्रसर है तो फिर शिक्षा व्यवसाय से जुड़ा व्यक्ति ही क्यों पीझे रहकर गरीबी के दंश का शिकार बने? 
    अतः यह कहना अनुचित नहीं है कि समय चक्र के साथ चलने के प्रयास में ही “शिक्षा एक व्यवसाय बन कर रह गया है।
धन्यवाद!
लेखिका –
सुषमा श्रीवास्तव 
मौलिक विचार 
उत्तराखंड।
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