सकरात्मकता की बातें करना आसान है। पर सकरात्मक बने रहना बहुत कठिन है। किसी न किसी बात से मन को ठेस पहुंच ही जाती है। फिर न चाहते हुए भी नकरात्मक विचार मन में पैंठ बनाने लगते हैं। 
   विचार करता हूं कि ये विचार ही क्यों आते हैं। यदि विचार ही न आयें तो फिर न बुरा लगेगा और न भला। समदृष्टता की स्थिति बन सकती है। 
  फिर दूसरी तरफ लगने लगता है कि समदृष्टि होने का अर्थ विचारशून्यता तो नहीं है। विचारों के प्रवाह में समन्वय स्थापित करना ही समदृष्टि व्यक्ति की पहचान है। 
  सच्ची बात यही है कि एक ही बात को सभी अलग अलग तरीके से सोचते हैं। यही अलग अलग चिंतन विभिन्न सिद्धांतों को जन्म देता है। जिनमें से कोई भी गलत नहीं है। 
  वर्ष २०१५ में कासगंज के मेरे एक अधीनस्थ गायब हो गये थे। आज तक उनकी गुमशुदगी एक रहस्य बनी हुई है। पर सच्ची बात है कि मैंने उनकी छाया का अनुभव किया है। एक बार जब एक्सचेंज में तकनीकी कमी सही करने मैं रात में लगभग आठ बजे एक्सचेंज गया था तब मैंने एक्सचेंज में उनकी धुंधली सी छवि देखी थी। उस समय भय के कारण मैं वहां से चला आया। मेरा साहस उस छाया से बात करने का न हुआ। 
  मुझे याद है कि उस वर्ष श्राद्ध पक्ष में मुझे एक बार फिर से उनकी अनुभूति हुई। फिर मैंने सोरों जाकर उनके निमित्त कुछ श्रद्धा से दान दिया। तथा उस समय के बाद से उनकी अनुभूति मुझे या किसी अन्य को नहीं हुई है। 
   ईश्वर सभी को सुखी रखें। सभी को परेशानियों से बचाते रहें। सभी का जीवन सुखद रहे। तथा सभी एक दूसरे की उन्नति में सहायक बनें। इसी प्रार्थना के साथ आज की डायरी का समापन करता हूं। 
आप सभी को राम राम। 
 
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