दुपहरी का जाना,वो शाम का आना
शाम का नाश्ता,और वो चाय बनाना,
तेरे आने से पहले वो मेरा सँवर जाना
उबलती चाय और उसकी खुशबू से वो
मेरा चेहरा महकना, समझ नहीं आता,
तुम उस चाय से खुश होते हो या फ़िर,
उस नाश्ते के कुरकुरेपन से या स्वाद से,
पर कभी कभी सोचती हूँ मैं, कि तुम्हें,
चाय की उड़ती हुई भीनी भाप के पीछे,
तुम्हारी नज़रों में,अपना अक्स तलाशती,
सँवरी हुई,मुस्कराती,क्या नजर आती हूँ मैं,
तुम दिनभर काम करके, थककर आये हो,
ये सोचती,तुम्हारा हरपल खुशनुमाँ बनाने को,
बाट जोहती,कभी तुम्हारे ख्यालों में आती हूँ मैं,
तुम कितना कुछ करते हो हमारे लिए,ये कहती
और सबको सुनाती और जताती हूँ मैं,पर कभी
सुबह से शाम तुम्हारे लिए,कितने जतन करती हूँ,
मुस्कराते हुये, तुम्हारे मुहँ से सुनने को बेताब हूँ मैं,
सालों से कितना कुछ कर रही हूँ,शाम के नाश्ते पर
आमने सामने होते हैं जब, तो चाय का कप बढ़ाती,
उसके पीछे से झाँकती,तुम्हें कभी दिखती हूँ या नहीं मैं,
✍️शालिनी गुप्ता प्रेमकमल 🌸
(स्वरचित सर्वाधिकार सुरक्षित)
