उस माँ को करू नमन बार बार
कोख से जन्मे बेटे को
जिसने मातृभूमि पर दिया वार,
सरहद पर अपने लाल जो
कर देती है कुर्बान,
संतानों को जो वीरभूमि
को दे देती दान,
ममता का मोह छोड़ जो
माटी का क़र्ज़ चुकाती है,
उसके शहीद बेटे का शव
लिपट तिरंगे में आता है,
जख्मों से भरे सीने को
जीवन भर सिल कर
वह रह जाती है।
उस बहन को करू नमन बार बार
भाई की कलाई पर रक्षासूत्र जो
देश की रक्षा का बांध जाती है,
बलिदानी मिट्टी के रंग में रंगा
तिलक माथे पर लगाती है,
राखी के बंधन का उपहार
अनोखा वो भाई दे जाता है,
सरहद पर शहीद हो वो वीर
बहिन को दिया वचन निभाता है।
उन भार्ययों को करू नमन बार बार
देश की आन, बान, शान को जो
अपना सुहाग लुटाती है,
भारत माँ की फौज में खड़ा कर उन्हें
नितांत अकेली रह जाती है,
देशवासियों के सुख चैन की खातिर
स्वयं आजीवन बेचैन रहती है।
उस नन्हीँ परी के समक्ष हम
सब शीश झुकाते है,
शहीद पिता से मिलने के सपने जो
हर इक क्षण सजाती है,
अभिमान से ऊँचा सिर रख
सैनिक की बेटी जो कहलाती है।
स्वयं से ऊपर रखते है जो भारत माँ की आन
अमर रहेगा ऐसे ही शहीद का परिवार !!!!!
स्वरचित
शैली भागवत  ‘आस ‘
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