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जीवन की शतरंज लगी है,
प्यादा समझे खुद को राजा।
भरा हुआ कितना अहम है, 
पूरा समझे है पर आधा।
नहीं उसे अहसास के वो क्या है, 
क्या आगे हो सकता।
ऊपर जो ईश्वर बैठा है,
बाजी सारी पलट सकता।
गर्व दम्भ के मारे देखो,
कर्मो का भी बोध नहीं।
सही है क्या और गलत है क्या,
करना जो मन आये वही।
अंतिम बाजी होगी जब,
तब याद उसे आ जायेगा,
प्रभु की सत्ता का अपमान कर,
फिर उस दिन पछतायेगा।
क्यों इतना तू दम्भशील है,
जितना भी कुकृत्य तू कर,
याद तुझे सब तब आएगा,
जो बोया तूने वो पायेगा।
इंदु विवेक उदैनियाँ
स्वरचित
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