पौराणिक कथाओं के रहस्य में आज हम ” शतरंज ” पर बात करेंगे । आपको यह जानकर आश्चर्य होगा, आपको ही क्या मुझे भी यह जानकर आश्चर्य हुआ था जब मैंने पहली बार यह पढ़ा था कि शतरंज का आविष्कार रावण की पहली पत्नी मंदोदरी ने सबसे पहले किया था । जी हां यह सही है ।
भारत में शतरंज का अस्तित्व सतयुग काल से ही माना जाता है । रामायण में उल्लेख है कि रावण का मनोरंजन करने के लिए उसकी पत्नी मंदोदरी ने शतरंज का खेल प्रारंभ किया था। मंदोदरी रामायण के पंच कन्याओं में से एक है जिन्हें चिर कुमारी कहा गया है । रावण की पत्नी मंदोदरी असुरराज मायासुर और अप्सरा हेमा की पुत्री थी । मंदोदरी बहुत सुंदर, गुणवान और पतिव्रता स्त्री थीं । अप्सरा हेमा की पुत्री होने के कारण वह बहुत ही सुन्दर थी । यहां तक कि जब हनुमान जी ने लंका में उसे देखा तो एक पल को वो रानी मंदोदरी को ही माता सीता समझ बैठे थे । मैंने रानी मंदोदरी को गुणवान इसलिए कहा क्योंकि रानी मंदोदरी कई कलाओं में अपनी कुशलता प्रर्दशित कर चुकी थी और साथ वह विदुषी भी थी । वह रावण को सदा अच्छी सलाह देती रहती थी । क्या हम सोच सकते हैं कि रावण जैसे पापी की पत्नी की गिनती पाॅंच पतिव्रता और महान स्त्रियों में होती है ? जी हां यह भी सच है । पाॅंच पतिव्रता और महान स्त्रियों में मंदोदरी का नाम भी शामिल है । मंदोदरी से रावण के विवाह के पश्चात ही मायासुर ने उपहारस्वरूप रावण के लिए सोने की लंका का निर्माण किया था ।
हां तो मैं शतरंज की बात कर रही थी । मंदोदरी अपने पति रावण से अधिक प्रेम करती थी और वह मायावी विद्याओं में माहिर होने के साथ-साथ अनेक कलाओं में भी निपुण थी ।वह रावण की मनोस्थिति से भली-भांति परिचित थी इसलिए रानी मंदोदरी ने शतरंज का प्रारंभ इस उद्देश्य से किया था कि उसका पति रावण अपना सारा समय युद्ध और युद्ध अभ्यास में ना व्यतीत कर सके । रानी मंदोदरी ने अपने पति रावण के लिए एक ऐसे खेल का निर्माण किया जिसे खेलने पर युद्ध जैसा ही माहौल होता है और जिसकी व्यूह रचना को तोड़ना युद्ध जीतने के ही समान होता है । इसलिए इसे दिमाग और रणनीति का खेल भी कहा जाता है । रावण जब युद्ध से लौटता था तो मंदोदरी उसका मनोरंजन करने के लिए रावण के साथ शतरंज खेलती थी । जिस दौर में इस खेल की शुरुआत हुई थी वह युद्ध का दौर था । उस समय युद्ध अभ्यास किए तो जाते थे परन्तु सामने वाले शत्रु के मन की स्थिति को जानना मुश्किल हुआ करता था । ऐसे में यह खेल बहुत सहायक सिद्ध हुआ और बिना मैदान में गए बुद्धि की बदौलत युद्ध कला को समझना आसान हो गया । शतरंज का प्रारंभिक नाम चतुरंग था जिसका उल्लेख बाणभट्ट ने ने अपनी पुस्तक ” हर्षचरित ” में भी की है । बाद में चतुरंग को ही चतुरंगिनी कहा जाने लगा जिसका अर्थ एक ऐसी सेना से है जिसके चार अंग होते हैं – पहला है पैदल , दूसरा है अश्व सवार , तीसरा है हाथी पर सवार और चौथा यानि अंत में रथ पर सवार ।
काले और सफेद रंग के चौखाने वाले 64 खाने पर खेला जाने वाला यह शतरंज का खेल बहुत रोचक और मनोरंजक होता है । दो खिलाड़ियों के बीच खेले जाने वाले इस खेल में खेलने वाले तो आनंद आता ही है बल्कि देखने वाले को भी यह खेल अपनी ओर आकर्षित करती है । शतरंज एक ऐसा खेल है जिसमें भरपूर बुद्धि का उपयोग होता है इसलिए यह खेल हमारे बौद्धिक विकास में अहम भूमिका निभाता है । इसको हर उम्र के लोग पसंद करते हैं इसलिए यह संपूर्ण विश्व में पसंद किया जाने वाला खेल भी है ।।
(रामायण से प्राप्त जानकारियों के आधार पर लिखने का एक छोटा सा प्रयास )
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धन्यवाद 🙏🏻🙏🏻
” गुॅंजन कमल ” 💓💞💗
