किसी भी इंसान को उसके व्यवहार सा परखा जा सकता है। जैसे किसी समाज का प्रतिदर्श साहित्य में मिलता है, सूर्य की आभा में ताप और रोशनी का आभास होता है चन्द्र की चन्द्रिका से शीतलता की अनुभूति होती है ठीक उसी प्रकार इंसान का व्यवहार व कृतित्व उसके व्यक्तित्व को परिचायक होता है।
हमारे व्यवहार में हमारे व्यक्तित्व की झलक झलकती है।हमारी छवि प्रतिबिम्बित होती है। व्यवहार में हमारी वैयक्तिक सोच, हमारे विचार, हमारे भावों का मर्म छिपा रहता है।व्यवहार से ही इन सभी की अभिव्यक्ति होती है। प्रत्येक व्यक्ति की अपनी विशेष छवि होती है और यह छवि स्पष्टतः व्यवहार में ही परिलक्षित होती है। बाह्य जगत में व्यवहृत कुछ भी नहीं है बल्कि हम अन्दर से जो कुछ भी हैं, उसकी झलक मात्र है। हम जैसे होते हैं वैसा ही व्यवहार करते हैं। होने और झलकने के बीच भी एक गहरा संबंध है जिसे नकारा नहीं जा सकता है।
प्रत्येक व्यक्ति के व्यक्तित्व की एक संरचना होती है ।जिसमें दृश्य अदृश्य अनेक तत्व होते हैं। जो दृश्य है वही हमारा व्यवहार है और जो अदृश्य पटल पर है उसमें हमारी आस्था, विश्वास, विचार, भाव और सोच सम्मिलित है। इन्हीं दृश्य-अदृश्य तत्वों के आधार पर हमारा प्रतिमान बनता है,हम समाज में अपनी पहचान बनाते हैं। यदि हमारा प्रतिमान स्वच्छ, निर्मल और विधेयात्मक है तो हमारी कार्यक्षमता बढ़ जाती है और हमारा व्यवहार शिष्ट एवं शालीन होता है व दूसरों को भी प्रभावित करता है।ऐसे लोग सज्जनता की श्रेणी में गिने जाते हैं। इनकी छवि आंतरिक व बाह्य दोनों रूप से परिष्कृत होती है। सफलता इनके निकट होती है अपने साथ-साथ उनका भी कल्याण होता हो जो इनके संसर्ग में आता है। हर स्थिति में समभावी होना इनकी विशेषता होती है।
इसके विपरीत आचरण वाला व्यक्ति ठीक उलटे परिणाम वाला होता है।
हमारे अंतर्भाव और चिंतन शैली ही हमारे व्यवहार में प्रतिमूर्त होते हैं और यही व्यवहार हमारे व्यक्तित्व का दर्पण बन जाता है।तभी तो कहते हैं कि जिस प्रकार साहित्य समाज का दर्पण है ठीक उसी प्रकार व्यवहार व्यक्तित्व का दर्पण है।
धन्यवाद!
लेखिका –
सुषमा श्रीवास्तव
उत्तराखंड।
