खोल देना चाहती हूँ
आज
उस बंद खिड़की को
जिसके बाहर सपने
पलते है..
हसीन ख्वाहिशों के मंज़र
जहाँ से गुजरते है..
गम जहाँ से निकलकर
खुशियों में बदलते है
अश्क़ दिलों के बहकर
शाद होते है..
फिज़ा में तराने प्यार के
गूंजते है..
खुल जाएंगी वो बंद खिड़की
जिस दिन पूरी तरह
दिल के दर्द सब हवा
के झोंके में बह जाएंगे..
ज़ार ज़ार टूटते रिश्ते
फिर एक हो जायेगे..
इंसां इंसां के एतबार
के काबिल हो जाएंगे..
मंज़िलों की हर राह
में हर तरफ फूल ही
फूल नज़र आएंगे।
… शैली भागवत ‘आस’✍️
