पिछले जन्म में राजकुमार ऋतुध्वज के साथ राज्य कार्य में हाथ बटाने बाली मदालसा का दूसरे जन्म में ऋतुध्वज के जीवन में आगमन रानी के रूप में हुआ। राजा और रानी दोनों प्रजाबत्सल थे। देश दिनों दिन उन्नति कर रहा था। जहाँ रानी मदालसा राजधानी और आस पास के क्षेत्रों की व्यवस्था देखती थीं, वहीं महाराज बने ऋतुध्वज ने पूर्व की ही भांति कुवलय के साथ दूर दूर के क्षेत्रों में व्यवस्था के लिये जाते रहना जारी रखा। मदालसा एक आदर्श पत्नी के साथ एक आदर्श शासिका भी सिद्ध हो रही थी जिसकी क्षमता पर महाराज ऋतुध्वज को पूर्ण विश्वास हो चुका था।
   ऋतुध्वज और मदालसा के जीवन में आनंद का वह क्षण आया जबकि दोनों के प्रेम की साक्षी उनकी संतान का मदालसा के गर्भ में आगमन हुआ। पत्नी और रानी के रूप में अपनी भुमिका निभा रही मदालसा के जीवन में वह क्षण आने बाला था जबकि वह माॅ बनकर संसार को कुछ अलग कर दिखाने बाली थी। वैसे तो प्रत्येक मनुष्य का शिक्षण पूरे जीवन चलता ही रहता है। आजीवन वह कुछ न कुछ सीखता ही रहता है। फिर भी उसकी प्रथम शिक्षिका माॅ ही होती है। माॅ से सीखे संस्कारों की शिक्षा वह पूरे जीवन याद रखता है।
   गर्भ में पल रहे शिशु के आनंदमयी अनुभव के साथ साथ मदालसा उन विद्याओं को याद कर रही थी जिन्हें उसने अपने दो जन्मों में सीखा था। विचार मग्न थी कि वह अपने शिशु की प्रथम शिक्षिका बन उन्हें क्या सिखायेगी।
   नौ महीने शिशु को गर्भ में रखी मदालसा के सामने वह समय आ चुका था जबकि उसकी संतान उसके जीवन में आने बाली थी। उत्तम वैद्यों की निगरानी में प्रशिक्षित दासियों ने महारानी मदालसा का प्रसव कराया। राज्य को राजकुमार की प्राप्ति हुई। पूरे राज्य में उत्सव का आयोजन किया गया।
   राजकुमार के नामकरण संस्कार का अवसर था। विप्रो द्वारा मंत्रोच्चारण किया जा रहा था। महाराज ऋतुध्वज और महारानी मदालसा हवन कुंड में आहुतियां दे रहे थे। समस्त दरवारी और प्रजा के गणमान्य लोग उपस्थित थे। परिपाटी के अनुसार महाराज राजकुमार का नामकरण करेंगें। महाराज द्वारा दिये नाम से ही राजकुमार जाने जायेंगें।
  आंतरिक गुणों की पहचान हमेशा अति दुष्कर कार्य है। सत्य तो यह भी है कि एक शिशु को देख उसके बाह्य चरित्रों की व्याख्या करना भी पूरी तरह सही नहीं है। असल चरित्र तो उस समय संसार के समक्ष आते हैं जबकि वह शिशु अपना बचपन त्याग जीवन समर में आगे बढने लगता है। उसी समय निर्धारित किया जा सकता है कि नाम उसके चरित्रों का कितना प्रतिनिधित्व कर रहा है। ज्यादातर तो अमीरचंद्र बेहद गरीबी में जीते देखे जाते हैं। नयनसुख नाम बाले दुर्घटना में अपने नैत्र गंवा सकते हैं।फिर भी सत्य यही है कि बहुधा बच्चों का नामकरण माता पिता की उस बच्चे से अभिलाषा का ही द्योतक होता है।
  ” राजकुमार अपने तेज और पराक्रम से विश्व को चकित करने बाले रहेंगें। इनका नाम होगा विक्रांत।”
   महाराज द्वारा नामकरण करते ही दरवारी और प्रजाजनों द्वारा राजकुमार विक्रांत का नाम लेकर जयकारे लगाये जाने लगे। इस तुमुल ध्वनि के मध्य एक हसी की आवाज भी गूंज रही थी। हालांकि आरंभ में उस हास्य की ध्वनि को सुन पाना कठिन था पर राजकुमार विक्रांत के नाम का जयनाद बंद हो जाने पर भी वह हंसी की ध्वनि गूंजती रही। तब तक गूंजती रही जब तक कि महाराज ने खुद हंसने बाले को रोक न दिया।
  ” यह क्या महारानी। आप परम विदुषी हैं। आप जानती हैं कि समय विरुद्ध हसी किसी का भी उपहास बना देती है। फिर राजपरिवार के सदस्यों का आचरण ऐसा होना चाहिये कि उसका सभी अनुकरण कर सकें।”
  पति द्वारा टोकने पर मदालसा की हसी रुकी। समस्त प्रजाजनों को हाथ जोड़ मदालसा पुत्र विक्रांत को गोदी में लेकर राजमहल चली गयीं। कुछ ही देर में रनिवास में पुत्र विक्रांत को सुलाने के प्रयास में महारानी मदालसा की लोरी का स्वर गूंज रहा था।
शुद्धोसि बुद्धोसि निरंजनोसि
संसार माया परिवर्जितोसि
है जीव। आप शुद्ध हैं। ज्ञानी हैं। संसार की माया से अतीत हैं। यह शरीर आपका स्वरूप नहीं है। आप इस संसार की मान्यता से परे हैं। अजन्मा हैं।
तू ही शुद्ध है 
तू ही बुद्ध है 
संसार की माया 
छोड़ खुद से 
तू ही ईश्वर 
तू आजाद
अजन्मा, अव्यक्त
यही सत्य चिंतन
रखिये मन में “
  समय के साथ राजकुमार विक्रांत की आयु बढने लगी। बचपन में लोरी के माध्यम से ही माता मदालसा द्वारा दिये संस्कार उनके मन में स्थायी स्थान रख चुके थे। राजकुमार विक्रांत वीतरागिता के मार्ग पर बढ रहे थे। सांसारिक चिंतन से दूर थे। तथा गुरुकुल में भी विभिन्न सांसारिक विद्याओं से उदासीन रहे। एक जीवनमुक्त को भला संसार कब बांध सका है। वैराग्य को मन में रखे हुए को भला कौन संसार में रोक सका है। वैसे कहा जाता है कि संसार में रहकर भी संसार से वैराग्य बहुत कठिन स्थिति है। ज्यादातर लोग तो सन्यास लेकर भी संसार के मोह से छूट नहीं पाते हैं। कुछ वापस संसार में आ जाते हैं। और कुछ सन्यासी जीवन में भी अपने चारों तरफ एक संसार खड़ा कर लेते हैं। जीवनमुक्तता या तो अनेकों जन्मों की साधना का परिणाम है अथवा एक जीवनमुक्त माता की आरंभिक शिक्षा ही किसी साधक को जीवनमुक्त बना सकती है। राजकुमार विक्रांत उसी परम लक्ष्य के साधक बन रहे थे जिसका मूल वह लोरियाँ थीं जिन्हें वह शिशु काल में अपनी माता मदालसा के मुख से सुना करते थे।
क्रमशः अगले भाग में
दिवा शंकर सारस्वत ‘प्रशांत’
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